सोमवार, 5 अप्रैल 2010

आरबीआई और किसान



भारतीय रिज़र्व बैंक ने हाल ही में अपने ७५ साल पूरे किये हैं। देश भर में इस सिलसिले में कार्यक्रम शुरू किये गये हैं। बीते इन ७५ सालों में आर बी आई ने ढेरों कदम उठाएं हैं, लेकिन क्या इन कदमों का लाभ आप इंसान तक पहुँच सका हैं। जाहिर तौर पर इसका जबाव खोजना मुश्किल नहीं। आज भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा बैंकिंग सेवा का लाभ नहीं ले पा रहा हैं। सवाल उठता है की क्या देश में छह दशक बाद भी वित्तीय समावेश सही दिशा में हो रहा है या नहीं ? सवाल जायज़ है। देश भर में करीब ६ लाख गाँव हैं। जहाँ देश की तक़रीबन ७० फीसदी आबादी रहती है। लेकिन इसे उनकी बदकिस्मती ही कहा जायेगा कि उनके यहाँ आज भी बैंकिंग सेवाएँ नहीं हैं। ६ लाख में से सिर्फ ३०,००० गांवों में ही बैंको की शाखाएं मौजूद हैं। यानी देश के सिर्फ पांच फीसदी गांवों में ही किसी बैंक की पहुँच हो सकी है। औसत निकाला जाये तो 20 गांवों के लिए एक शाखा मौजूद है। हालाँकि पूर्वोत्तर इलाकों में तस्वीर और भयावह है। रंगराजन कमिटी के मुताबिक ''पूर्वोत्तर राज्यों के ६४ फीसदी परिवारों को संस्थागत स्रौत से कर्ज नहीं मिलता हैं।'' निजी बैंक अब भी गांवों में जाने से घबरा रहे हैं, अर्थशास्त्र की टर्म ''NPA'' हमेशा इसकी एक बड़ी बजह रही है। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जानकार मानते हैं की गाँव की तस्वीर अब बदल रही है। फिर भी बैंक हैं कि मानते ही नहीं। बैंकों के गांवों में ना जाने से तस्वीर काफी बदहाल नज़र आती है। एनएसएसओ (२००४-05) का सर्वे बताता है कि देश के ७३ फीसदी किसान आज भी संस्थागत स्रौत से कर्ज नहीं ले पाते हैं। ४.५० करोड़ किसान परिवार आज भी कहीं से कर्ज नहीं ले पाते हैं और जो २७ फीसदी किसान कर्ज ले भी पाते हैं, उनमें भी एक तिहाई लोग गैर संस्थागत स्रोत से भी कर्ज लेने को मजबूर हैं। वजह साफ़ है बैंक उनकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

यही वजह है की १९९१ से २००२ के बीच साहूकारों से कर्ज लेने वालों की संख्या में भी इजाफा दिखा है। १९९१ में १७.५ फीसदी लोग साहूकारों से क़र्ज़ लेते थे, २००२ में संख्या बढकर २६.८ फीसदी हो गया। यानी जैसे जैसे विकास कि बात ज्यादा हुई किसान साहूकारों कि दलदल में ज्यादा फंसता रहा। नतीजा किसान आत्महत्या को मजबूर होता चला गया।




१९९७ से २००७ तक देश भर में एक लाख बयासी हज़ार किसानों ने खुदखुशी का रास्ता चुना। अकेले सिर्क २००७ में देश के १६,632 किसानों ने आत्महत्या की। यानी हर रोज करीब ४५ किसान फांसी का फंदा चुनने को मजबूर हुए। सरकार बेबस दिखी। वहीं मीडिया के कथित समाज सुधारक ऐसी ख़बरों को दिखाकर सर्वश्रेष्ट रिपोर्टर का अवार्ड जीतते रहे।



बाद में सरकार जागी। किसानों को कर्ज की दलदल से मुक्त करने के मकसद से सरकार कर्ज माफ़ी की योजना के साथ सामने आई। कर्ज का दायरा साल दर साल बढ़ता रहा। बीते वित्त वर्ष में कर्ज प्रवाह के लिए ३,२५,००० करोड़ का प्रावधान रखा। लेकिन सवाल फिर से बैंकों की भूमिका पर उठे। अगस्त २००९ तक खरीफ फसल के लिए कुल कर्ज के ६० फीसदी की दरकार थी, लेकिन कर्ज जारी हुआ सिर्फ ३४ फीसदी। ऐसे में किसान साहूकार के पास क्यों न जाने को मजबूर हो ? नतीजा फिर से कर्ज की दलदल। वैसे बैंकों की ''गंभीरता'' और मुद्दों पर भी दिखती है। मसलन बैंकों की बेरुखी के चलते ट्रक्टर की बिक्री कम हो गयी है। २००८-०९ में ट्रक्टर की बिक्री में ५ फीसदी की कमी देखी गयी है। इस मसले में बैंकों की जिम्मेदारी इस लिए ज्यादा है क्योंकि ९० फीसदी ट्रक्टर की बिक्री बैंकों के जरिये होती है। ऐसे में जानकारों का एक तबका इस बात पार जोर डालने से नहीं चूकता है कि देश में कार खरीदना आसान है, लेकिन ट्रक्टर खरीदना मुश्किल। इसे इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

किसान क्रेडिट कार्ड इस दिशा में कुछ हद तक सफल रहे हैं, लेकिन तस्वीर यहाँ भी उतनी सुहानी नहीं जितने की दरकार है। वित्त मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में संसद में एक रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट में मुख्यतः केसीसी का ही जिक्र है। समिति ने पाया है की केसीसी के जरिये वितरित कर्ज में कमी आई है। २००५-०६ में केसीसी के जरिये ४७,601 करोड़ का कुल कर्ज वितरित किया गया था, जो २००६-०७ में घट कर ४०,३०० करोड़ ही रह गया। यानि करीब ७हज़ार करोड़ का कर्ज कम दिया गया, जिसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं निकले। इस दरमियाँ करीब ४० फीसदी कार्ड धारक को अपात्र माना गया। समिति ने कहा है की बैंक अपने १८ फीसदी के कर्ज वितरण के अनिवार्य स्तर को पाने में भी नाकाम रहे हैं, ये गंभीर चिंता का विषय है।

ग्रामीण इलाकों में किसी ज़माने में सहकारी बैंकों का प्रदर्शन काफी बेहतर था, लेकिन अब उनकी हिस्सेदारी में कमी आई है। १९९२ में सहकारी बैंकों की हिस्सेदारी ६२ फीसदी की थी जो आज घट कर २००७ में महज़ ३३ फीसदी पर सिमट चुकी है। हालाँकि रीजनल रुरल बैंक यानि आर आर बी की हिस्सेदारी में काफी इजाफा दिखा है। रंगराजन कमेटी ने माना है की आर आर बी ने कमर्शिअल बैंकों की अपेक्षाकृत बेहतर काम किया है। व्यास कमेटी मानती है की आर आर बी को आर बी आई के दायरे में लाया जाये और उन्हें पूर्ण स्वायत्त दिया जाये, लेकिन अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।

खुद रंगराजन साहेब मानते हैं की देश में वित्तीय सेवाओं का विस्तार हुआ हैं, लेकिन दायरे का विस्तार अभी भी उतना नहीं हो सका है, जितने की दरकार है। बीते तीन सालों में बैंकों की शाखाएं खोलने में महज़ 5 फीसदी की वृद्दि देखी गयी है। क्या यह पर्याप्त है?




यू एस में २७२० लोगों पर, ज़र्मनी में १९४५ लोगों पर और जापान में ३९६८ लोगों पर बैंक की एक शाखा मौजूद है, जबकि भारत में करीब १६००० हज़ार लोगों की बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए महज़ एक शाखा है।



देश की महिलाओं की स्थिति तो और ख़राब है। देश भर में बामुश्किल १ करोड़ महिलाएं ही ऐसी हैं, जिनका सरकारी बैंक में खाता है। देश में बैंकिंग सेवा की यह तस्वीर तब ऐसी है, जबकि दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क भारत में है। १९९९ से २००४ के बीच देश के मोबाइल धारकों की संख्या में करीब ६० फीसदी का इजाफा हुआ। लेकिन विस्तार की इतनी ही तेज़ रफ़्तार बैंकिंग सेवा के मामले में बीते ५० सालों में नहीं देखी जा सकी। क्या हमारे देश में रिलायंस मोबाइल के मालिक की सलाह की जरूरत है, जिन्होंने सबके हाथ में मोबाइल देने में अहम भूमिका निभायी या फिर हमें जरूरत बंगलादेश के मुहम्मद युनूस की है, जिन्होंने अपनी योजनाओं को पूरा कर नोबेल पुरुस्कार का सम्मान हासिल किया। मैं यहाँ मुकेश अम्बानी या मुहम्मद युनुस का पी आर नहीं कर रहा हूँ बल्कि यह जताने की कोशिश कर रहा हूँ की सरकार अपने समग्र विकास का सपना तभी पूरा कर सकती हैं जबकि बैंकिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव लाया जाये। इस उम्मीद में सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है।

उम्मीद है आपको पसंद आया होगा। सुझाव जरूर दें।
धन्यवाद।


5 टिप्पणियाँ:

अमित जैन (जोक्पीडिया ) ने कहा…

बहुत बढिया ,लिखते रहो

'अदा' ने कहा…

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है...
बहुत ख़ूब..
Word Verification हटा देंगे तो और भी अच्छी बात होगी...

RAJ SINH ने कहा…

आप का स्वागत है !
अदा जी के सुझाव देखें .

kshama ने कहा…

Anek shubhkamnaon sahit swagat hai!

संगीता पुरी ने कहा…

इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!