
हाल ही में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दो विधायकों को मार्शलों की मदद से बाहर निकालना पड़ा, वहीं राजस्थान में विधायकों की मार्शलों से भिड़न्त हुई। नतीजा चार विधायकों के चोटिल होने की खबर अखबारों और खब़रिया चैनलों में प्रमुखता से दिखी। कुछ दिन तक चला राजनीतिक ड्रामा आखिरकार समाप्त हुआ। मुख्यमन्त्री के दखल के बाद मामला सुलझा और शान्तिपूर्ण तरीके से सदन चलने की खबर आई। वैसे ये पहली बार नहीं है कि किसी राज्य विधानसभा में इस तरह का मामला सामने आया हो। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण और बाद में शोपिंया काण्ड को लेकर मचे बवाल की झलक लोग देख ही चुके हैं।
इस तरह की घटनाएं अक्सर सोचने को मजबूर करती हैं। क्या सदन के प्रति जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है? जानकारों का एक बड़ा तबका इस बदलाव की पुष्टि करता है। इस बदलाव की कई वजह हैं। किस तरह के जनप्रतिनिधियों को हम और आप चुनकर राज्य विधानसभाओं में भेज रहे हैं। वर्ष 2008 में पांच राज्यों (दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम) में विधानसभा चुनाव हुआ। गैर सरकारी संगठन `नेशनल इलेक्शन वॉच´ ने 549 विधायकों से प्राप्त हुई जानकारी के आधार पर चौंकाने वाली जानकारी दी। 549 में से 124 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। यानि हर 5 में एक विधायक दागी था। वैसे ये सिर्फ झलक भर है। उत्तर भारत के एक बड़े राज्य के 49 काबीना मन्त्रियों में से 22 मन्त्री हत्या या किसी अन्य संगीन मामले में अदालत के चक्कर लगा रहे थे।
स्थिति साफ लेकिन चिन्ताजनक है। हत्या, अपहरण, लूट और फिरौती के मामले में दोषी लोग जब विधायक बनेंगे तो विधानसभा में ऐसा होना चौकाने वाला नहीं लगना चाहिए। राजनीति का अपराधीकरण या अपराधीकरण की राजनीति का सवाल पेचीदा हो चला है। हालांकि घोर आशावादी ऐसा नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि देश की 4100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि काफी कम हैं और जनता अपने वोट के प्रति गम्भीर हो रही है।
अपराधीकरण के बाद दूसरी वजह मीडिया की भूमिका को भी माना जाता है। टेलीविजन ने मानों जनप्रतिनिधियों का `कर्तव्य´ ही बदलकर रख दिया है। वैसे अखबार जगत का भी इस कार्य में अहम योगदान है। विधायकों और सांसदों को लगता है कि शोरशराबा, हंगामा और माइक तोड़कर ही सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं। इससे अपने चुनाव क्षेत्र की जनता को अपनी `जिम्मेदारी´ और `कर्तव्य परायणता´ का एहसास कराया जा सकता है। ऐसा होता भी है।
कुछ और पहलू भी गौर करने लायक हैं। विधानसभा और संसद की बैठकों की संख्या साल दर साल कमी होती जा रही है। 1952-1961 के बीच संसद की औसतन सालाना बैठक 124 दिन हुआ करती थी। 1992-2001 तक औसतन सालाना बैठक घटकर 81 दिन रह गई। 2008 में संसद की कार्रवाई महज 46 दिन तक चल सकी, जो अभी तक सबसे कम थी। 1988 में आखिरी बार लोकसभा की कार्रवाई 100 दिन से ज्यादा चल सकी थी। वहीं 1974 में राज्यसभा की सालाना बैठक 100 दिन का आंकड़ा आखिरी बार छू सकी थी। ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिकी कांग्रेस में सालभर में आज भी औसतन 140 से 150 दिन सदन चलता है। संसद की कार्रवाई न्यूनतम कितने दिन हो, इसको लेकर भारतीय संविधान में कोई खास उल्लेख नहीं है। बस दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अन्तराल नहीं होना चाहिए। वैसे संसद की कार्रवाई सालभर में कम से कम 100 दिन और विधानसभाओं की बैठक उनकी सीटों की संख्या के आधार पर चले, इस बात पर खासा जोर दिया जाता रहा है।
मौजूदा लोकसभाध्यक्ष की कोशिश भी सदन की कार्रवाई कम से कम 100 दिन चलाने की है। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों में भी इस बारे में खासी चर्चा होती रही है। लेकिन कोई सकारात्मक नतीजा नहीं दिख सका है। राजस्थान की 11वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 143 दिन और 12वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 140 दिन ही सदन चल सका है। उत्तराखण्ड में 2007 में कुल 16 जबकि 2008 में कुल 20 बैठकें हुई हैं। कर्नाटक विधानसभा में साल भर में कभी 90 से ज्यादा बैठकें होती थीं, आज आंकड़ा 30 के करीब सिमट चुका है। ये सिर्फ उदाहरण भर हैं। अधिकांश विधानसभाओं की कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा माना जाता है कि यदि सदन ज्यादा दिन चलता है तो विपक्ष के पास अपनी बात रखने का पर्याप्त समय होता है, जो हंगामे को कम करने में मददगार होता है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही हैं। जिसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सही नहीं कहा जा सकता है। लिहाजा जिम्मेदारी कार्यपालिका की भी है। वैसे एक सवाल विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भी है। जितने दिन सदन चलता है क्या उतने दिन जनप्रतिनिधि सदन के प्रति पर्याप्त समय निकाल पाते हैं? इसके साथ ही गम्भीर मुद्दों और विधेयकों पर चर्चा का समय भी साल दर साल घटता जा रहा है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष की चुनौतियां भी ज्यादा हो जाती हैं।
आखिर में इन घटनाओं को रोकने के लिहाज से कई सुझाव सामने आते हैं। मसलन, विधायकों को सदन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। मीडिया को अपनी गम्भीरता दिखानी होगी। कार्यपालिका को ज्यादा दिन सदन चलाने की कोशिश करनी होगी। जनप्रतिनिधियों का गम्भीर बहस में ज्यादा हिस्सेदारी और सदन में पर्याप्त उपस्थिति का प्रयास हो। गम्भीर भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधि को सदन में प्रोत्साहित और सम्मानित किया जाए। साथ ही `काम नहीं तो वेतन-भत्ता नहीं´ पर विचार हो। राजनीति में अपराधीकरण कम हो और विधानसभा अध्यक्ष को अपनी निष्पक्षता का एहसास हो। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा हो पाना किसी सपने के सच होने के समान है। लेकिन अगर सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती है तो क्या सदन की कोई सकारात्मक तस्वीर आएगीर्षोर्षो क्या तब माइक नहीं टूटेंगे? क्या तब सिर्फ गम्भीर चर्चाएं होगीं? क्या तब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा जनता अपने नेता से उम्मीद रखती है? फिलहाल सिर्फ उम्मीदें रखी जा सकती हैं।
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धन्यवाद।
इस तरह के शोरशराबे, हंगामे और भिड़न्त के लिए उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले सबके जे़हन में आता है, लेकिन बाकी कई राज्य विधानसभाएं भी इस कतार में खड़ी नज़र आती हैं। बीते साल फरवरी में आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी मार्शल और विधायक आमने-सामने थे। बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की विधायिकाओं में भी जनप्रतिनिधि अपनी ``जिम्मेदारी´´ का एहसास कराते रहे हैं।
इस तरह की घटनाएं अक्सर सोचने को मजबूर करती हैं। क्या सदन के प्रति जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है? जानकारों का एक बड़ा तबका इस बदलाव की पुष्टि करता है। इस बदलाव की कई वजह हैं। किस तरह के जनप्रतिनिधियों को हम और आप चुनकर राज्य विधानसभाओं में भेज रहे हैं। वर्ष 2008 में पांच राज्यों (दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम) में विधानसभा चुनाव हुआ। गैर सरकारी संगठन `नेशनल इलेक्शन वॉच´ ने 549 विधायकों से प्राप्त हुई जानकारी के आधार पर चौंकाने वाली जानकारी दी। 549 में से 124 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। यानि हर 5 में एक विधायक दागी था। वैसे ये सिर्फ झलक भर है। उत्तर भारत के एक बड़े राज्य के 49 काबीना मन्त्रियों में से 22 मन्त्री हत्या या किसी अन्य संगीन मामले में अदालत के चक्कर लगा रहे थे।
स्थिति साफ लेकिन चिन्ताजनक है। हत्या, अपहरण, लूट और फिरौती के मामले में दोषी लोग जब विधायक बनेंगे तो विधानसभा में ऐसा होना चौकाने वाला नहीं लगना चाहिए। राजनीति का अपराधीकरण या अपराधीकरण की राजनीति का सवाल पेचीदा हो चला है। हालांकि घोर आशावादी ऐसा नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि देश की 4100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि काफी कम हैं और जनता अपने वोट के प्रति गम्भीर हो रही है।
अपराधीकरण के बाद दूसरी वजह मीडिया की भूमिका को भी माना जाता है। टेलीविजन ने मानों जनप्रतिनिधियों का `कर्तव्य´ ही बदलकर रख दिया है। वैसे अखबार जगत का भी इस कार्य में अहम योगदान है। विधायकों और सांसदों को लगता है कि शोरशराबा, हंगामा और माइक तोड़कर ही सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं। इससे अपने चुनाव क्षेत्र की जनता को अपनी `जिम्मेदारी´ और `कर्तव्य परायणता´ का एहसास कराया जा सकता है। ऐसा होता भी है।
चार-पांच घंटे की तैयारी कर चर्चा में भाग लेने वाले जनप्रतिनिधि अगले दिन अखबार में अपना नाम पाने को तरस जाते हैं। अखबारों में ऐसे गम्भीर जनप्रतिनिधियों के लिए स्पेस नहीं होता और ख़बरिया चैनलों की टीआरपी का तो इससे कोई वास्ता ही नहीं है। लिहाजा जनप्रतिनिधि खुद को हतोत्साहित महसूस करता है। जबकि हंगामा, सदन ना चलने देना या मार्शल से भिडन्त मीडिया के लिए मसाले का काम करती है।जो जितने भयावह तरीके से ख़बर पेश करता है वो ही शायद सबसे ज्यादा खुद पर इठलाता है। ऐसे में जिम्मेदारी दोनों की है। लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ को अपनी गम्भीरता समझनी होगी।
कुछ और पहलू भी गौर करने लायक हैं। विधानसभा और संसद की बैठकों की संख्या साल दर साल कमी होती जा रही है। 1952-1961 के बीच संसद की औसतन सालाना बैठक 124 दिन हुआ करती थी। 1992-2001 तक औसतन सालाना बैठक घटकर 81 दिन रह गई। 2008 में संसद की कार्रवाई महज 46 दिन तक चल सकी, जो अभी तक सबसे कम थी। 1988 में आखिरी बार लोकसभा की कार्रवाई 100 दिन से ज्यादा चल सकी थी। वहीं 1974 में राज्यसभा की सालाना बैठक 100 दिन का आंकड़ा आखिरी बार छू सकी थी। ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिकी कांग्रेस में सालभर में आज भी औसतन 140 से 150 दिन सदन चलता है। संसद की कार्रवाई न्यूनतम कितने दिन हो, इसको लेकर भारतीय संविधान में कोई खास उल्लेख नहीं है। बस दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अन्तराल नहीं होना चाहिए। वैसे संसद की कार्रवाई सालभर में कम से कम 100 दिन और विधानसभाओं की बैठक उनकी सीटों की संख्या के आधार पर चले, इस बात पर खासा जोर दिया जाता रहा है।
मौजूदा लोकसभाध्यक्ष की कोशिश भी सदन की कार्रवाई कम से कम 100 दिन चलाने की है। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों में भी इस बारे में खासी चर्चा होती रही है। लेकिन कोई सकारात्मक नतीजा नहीं दिख सका है। राजस्थान की 11वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 143 दिन और 12वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 140 दिन ही सदन चल सका है। उत्तराखण्ड में 2007 में कुल 16 जबकि 2008 में कुल 20 बैठकें हुई हैं। कर्नाटक विधानसभा में साल भर में कभी 90 से ज्यादा बैठकें होती थीं, आज आंकड़ा 30 के करीब सिमट चुका है। ये सिर्फ उदाहरण भर हैं। अधिकांश विधानसभाओं की कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा माना जाता है कि यदि सदन ज्यादा दिन चलता है तो विपक्ष के पास अपनी बात रखने का पर्याप्त समय होता है, जो हंगामे को कम करने में मददगार होता है।
ऐसे में कहा जा सकता है कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही हैं। जिसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सही नहीं कहा जा सकता है। लिहाजा जिम्मेदारी कार्यपालिका की भी है। वैसे एक सवाल विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भी है। जितने दिन सदन चलता है क्या उतने दिन जनप्रतिनिधि सदन के प्रति पर्याप्त समय निकाल पाते हैं? इसके साथ ही गम्भीर मुद्दों और विधेयकों पर चर्चा का समय भी साल दर साल घटता जा रहा है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष की चुनौतियां भी ज्यादा हो जाती हैं।
निष्पक्ष रहते हुए सदन की कार्रवाई सुचारू ढंग से चलाना आज के दौर में टेढी खीर साबित हो रहा है। अध्यक्ष की निष्पक्षता भी अक्सर सवालों के घेरे में दिखती है। कहीं ये सवाल काफी हद तक सही भी दिखते हैं और कहीं सिर्फ राजनीति से प्रेरित।विधानसभा अध्यक्ष को अपनी मूल पार्टी की बैठकों में शामिल होना चाहिए या नहीं? यह मुद्दा अभी भी चर्चा का विषय है। लेकिन स्पीकर भी मूलत: राजनीतिक दल के नेता होते हैं। पांच साल बाद उन्हें भी अपनी चुनावी वैतरणी पार लगानी होती हैं। लिहाजा वे करें भी तो क्यार्षोर्षो ऐसे में सवाल उठने भी जायज हैं।
आखिर में इन घटनाओं को रोकने के लिहाज से कई सुझाव सामने आते हैं। मसलन, विधायकों को सदन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। मीडिया को अपनी गम्भीरता दिखानी होगी। कार्यपालिका को ज्यादा दिन सदन चलाने की कोशिश करनी होगी। जनप्रतिनिधियों का गम्भीर बहस में ज्यादा हिस्सेदारी और सदन में पर्याप्त उपस्थिति का प्रयास हो। गम्भीर भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधि को सदन में प्रोत्साहित और सम्मानित किया जाए। साथ ही `काम नहीं तो वेतन-भत्ता नहीं´ पर विचार हो। राजनीति में अपराधीकरण कम हो और विधानसभा अध्यक्ष को अपनी निष्पक्षता का एहसास हो। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा हो पाना किसी सपने के सच होने के समान है। लेकिन अगर सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती है तो क्या सदन की कोई सकारात्मक तस्वीर आएगीर्षोर्षो क्या तब माइक नहीं टूटेंगे? क्या तब सिर्फ गम्भीर चर्चाएं होगीं? क्या तब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा जनता अपने नेता से उम्मीद रखती है? फिलहाल सिर्फ उम्मीदें रखी जा सकती हैं।
इस लेख को प्रभासाक्षी.कॉम पर भी देखा जा सकता है। सुझाव जरूर दें।
धन्यवाद।


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