''महंगाई से निपटने के लिए केंद्र दिखा गंभीर, अलग अलग तीन कमेठियाँ गठित''
राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोर ग्रुप की बैठक में यह अहम फैसला लिया गया। कोर ग्रुप की यह पहली बैठक थी। लिहाज़ा इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन यह उपलब्धि आखिर है किसकी? केंद्र की ? राज्यों की ? या फिर आम इंसान की ? बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है। खाद्य मुद्रा स्फीति १७.७ फीसदी के आंकड़े को छु चुकी है। ज़ाहिर है सरकार के सामने मुश्किलें और ज्यादा बढ गयी हैं। ऐसे में कमेटियों के इस गठन के कई पहलू सामने आते हैं।
01- संसद में जब विपक्ष महंगाई के मुद्दे को उठाने की कोशिश यह समझाने की होगी कि राज्यों के साथ बात हो चुकी है। कमेटियां गठित कर दी गयी हैं। रिपोर्ट जल्द आने वाली है। उसके आधार पर कदम उठाये जायेंगे। इन तीन कमेटियों में से एक के मुखिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। लिहाज़ा बीजेपी को भी चुप करने की कोशिश की गयी है।
02 - जब तक इन कमेटियों की रिपोर्ट आएगी तब तक रबी की फसल भी आ चुकी होगी। जानकर मानते हैं कि कीमतें खुदबखुद कम हो चुकी होंगी। ऐसे में रिपोर्ट का औचित्य ही नहीं रहेगा।
०३- जिन तीन मुद्दों को लेकर कमिटी गठित की गयी हैं। क्या इनपर पहले कोई कमिटी नहीं बनी? कृषि उत्पादन, सार्वजानिक वितरण प्रणाली और उपभोक्ता मामलों पर इस देश में अनेकों कमेटियां बन चुकी हैं। सिफारिशों का ढेर सा लग चूका है। उन सिफारिशों पर क्या सरकार ने कभी कुछ कदम उठाए हैं? अधिकतर पर नहीं। ऐसे में जो सिफारिशें यह कमेटियां देंगी। क्या गारंटी है कि सरकार उनको मानेगी ही?
०४ - इस पूरी रस्साकशी का आम इंसान को क्या फायदा? मेरे ख़याल में कुछ नहीं। वो पहले भी महंगाई से परेशान था। आज भी है और मौजूदा हालात को देख कर लगता है कि आने वाले दिनों में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक अच्छी बात ज़ेहन में आती है और वो है केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर होते रिश्ते। शायद यह पहला मौका होगा जब केंद्र ने महंगाई जैसे मुद्दे पर राज्यों को साथ लिया हो। भले ही इसके पीछे राजनीती ही हो और vat के बाद यह शायद दूसरा मौका होगा जबकि केंद्र और राज्यों के बीच कोई कमिटी गठित की। vat के परिणाम सकारात्मक दिखे हैं। वजह दोनों के बीच का बेहतर तालमेल मानी जा सकती है। यह एक अच्छी पहल जरूर कही जा सकती है। भले ही इसके नतीजों को लेकर मैं ज्यादा उम्मीदें ना रखता हूँ।
चाहिए रोज़गार का अधिकार !
1 साल पहले


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