लोक सभा अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गयी है। तमाम सांसद अपने अपने संसदीय इलाकों का रुख कर चुके होंगे या करने वाले होंगे। जानकार यह पता लगाने में जुटे होंगे कि सत्र कैसा रहा? सांसद भी अपनी सक्रियता और निष्क्रियता की वज़ह तलाशने में व्यस्त होंगे।
आई पी एल विवाद, फ़ोन टेपिंग, टू जी स्पेक्ट्रुम, मुंबई मोटर मैनों की हड़ताल जैसे मुद्दों की गर्माहट सदन में छाई रही। साथ ही जनप्रतिनिधियों का व्यवहार भी बदलता दिखा। मसलन, भाजपा नेता अनंत कुमार और लालू यादव के बीच की गर्माहट हो या सुदीप बंदोपाध्याय और बासुदेव आचार्य के बीच का विवाद। खुद लोक सभा अध्यक्ष भी बदलते व्यवहार पर नाराज दिखीं। उधर प्रणव दादा भी कुछ सांसदों के व्यवहार पर गुस्से में आग बबूला हुए।
इन सब उठा पटक के बीच २०१० के इस बजट सत्र में कुल 32 बैठकें हुई। इससे पिछले बजट सत्र में कुल बैठकें २६ दिन की थी। इस बार सदन कुल १३७ घंटे चला जबकि पिछली बार लोक सभा में कुल कार्यवाही करीब १६२ घंटे की थी। यानि इस बार बैठकें जरूर ज्यादा रही हों लेकिन कुल घंटे कम हैं। इस बार करीब ७० घंटे शोर शराबे की भेंट चढ़े जबकि पिछली बार सिर्फ २३ घंटे ही सदन की कार्यवाही हंगामे के चलते बर्बाद हुई थी। पिछले बजट सत्र में करीब ३१ घंटे सदन की कार्यवाही ज्यादा चली और जरूरी कामकाज निपटाया गया। हालाँकि इस बार निर्धारित समय के अतिरिक्त सिर्फ १९ घंटे ही ''माननीयों'' ने सदन में बैठना मुनासिब समझा। इसी तरह पिछले बजट सत्र में प्रश्नकाल के दौरान रोज़ औसतन ३.३४ सवाल पूछे गये। इस बार यह आंकड़ा घट कर सिर्फ २.३७ सवाल प्रति दिन पर सिमटा है। इस सत्र में कुल ६२० तारांकित सवाल सूची में दर्ज थे, जिनमे से सिर्फ ७६ के ही जवाब दिए जा सके। पिछले बजट सत्र में ५०० सवाल सूची में दर्ज थे, पूछे गये ८७। बजट सत्र २०१० में कुल २७ विधेयक पेश हुए। २१ विधेयक पारित भी हुए। बजट सत्र २००९ में १६ विधेयक पेश हुए और कुल ८ विधेयक ही पास हो सके। पिछले सत्र में कुल ३० निजी विधेयक पेश हुए थे लेकिन इस बार ४५ निजी विधेयक पेश किये गये हैं।
इस लिहाज़ से अगर दोनों सत्रों की तुलना की जाये तो समझ में आता है की इस बार बैठेकें ज्यादा हुई हैं, सरकारी और निजी दोनों विधेयक अपेक्षाकृत ज्यादा पेश हुए हैं और सरकारी विधेयक ज्यादा पारित भी हुए हैं। लेकिन इस बार लोक सभा का समय हंगामे के चलते ज्यादा बर्बाद हुआ है, सवाल कम पूछे गये हैं, अतिरिक्त बैठकें कम हुई हैं और सवाल भी कम पूछे जा सके हैं।
तस्वीर बेहतर नहीं कही जा सकती। खुद लोकसभाध्यक्ष भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। प्रश्नकाल बेहतर तरह से चल सके, इसको लेकर लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति दोनों चिंतित हैं। प्रश्नकाल के समय बदलने की बात भी की जा रही है। वक़्त आ गया है की तमाम माननीयों को संसद की गरिमा, महत्व और अपनी गंभीरता को समझना होगा।
आई पी एल विवाद, फ़ोन टेपिंग, टू जी स्पेक्ट्रुम, मुंबई मोटर मैनों की हड़ताल जैसे मुद्दों की गर्माहट सदन में छाई रही। साथ ही जनप्रतिनिधियों का व्यवहार भी बदलता दिखा। मसलन, भाजपा नेता अनंत कुमार और लालू यादव के बीच की गर्माहट हो या सुदीप बंदोपाध्याय और बासुदेव आचार्य के बीच का विवाद। खुद लोक सभा अध्यक्ष भी बदलते व्यवहार पर नाराज दिखीं। उधर प्रणव दादा भी कुछ सांसदों के व्यवहार पर गुस्से में आग बबूला हुए।
इन सब उठा पटक के बीच २०१० के इस बजट सत्र में कुल 32 बैठकें हुई। इससे पिछले बजट सत्र में कुल बैठकें २६ दिन की थी। इस बार सदन कुल १३७ घंटे चला जबकि पिछली बार लोक सभा में कुल कार्यवाही करीब १६२ घंटे की थी। यानि इस बार बैठकें जरूर ज्यादा रही हों लेकिन कुल घंटे कम हैं। इस बार करीब ७० घंटे शोर शराबे की भेंट चढ़े जबकि पिछली बार सिर्फ २३ घंटे ही सदन की कार्यवाही हंगामे के चलते बर्बाद हुई थी। पिछले बजट सत्र में करीब ३१ घंटे सदन की कार्यवाही ज्यादा चली और जरूरी कामकाज निपटाया गया। हालाँकि इस बार निर्धारित समय के अतिरिक्त सिर्फ १९ घंटे ही ''माननीयों'' ने सदन में बैठना मुनासिब समझा। इसी तरह पिछले बजट सत्र में प्रश्नकाल के दौरान रोज़ औसतन ३.३४ सवाल पूछे गये। इस बार यह आंकड़ा घट कर सिर्फ २.३७ सवाल प्रति दिन पर सिमटा है। इस सत्र में कुल ६२० तारांकित सवाल सूची में दर्ज थे, जिनमे से सिर्फ ७६ के ही जवाब दिए जा सके। पिछले बजट सत्र में ५०० सवाल सूची में दर्ज थे, पूछे गये ८७। बजट सत्र २०१० में कुल २७ विधेयक पेश हुए। २१ विधेयक पारित भी हुए। बजट सत्र २००९ में १६ विधेयक पेश हुए और कुल ८ विधेयक ही पास हो सके। पिछले सत्र में कुल ३० निजी विधेयक पेश हुए थे लेकिन इस बार ४५ निजी विधेयक पेश किये गये हैं।
इस लिहाज़ से अगर दोनों सत्रों की तुलना की जाये तो समझ में आता है की इस बार बैठेकें ज्यादा हुई हैं, सरकारी और निजी दोनों विधेयक अपेक्षाकृत ज्यादा पेश हुए हैं और सरकारी विधेयक ज्यादा पारित भी हुए हैं। लेकिन इस बार लोक सभा का समय हंगामे के चलते ज्यादा बर्बाद हुआ है, सवाल कम पूछे गये हैं, अतिरिक्त बैठकें कम हुई हैं और सवाल भी कम पूछे जा सके हैं।
तस्वीर बेहतर नहीं कही जा सकती। खुद लोकसभाध्यक्ष भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। प्रश्नकाल बेहतर तरह से चल सके, इसको लेकर लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति दोनों चिंतित हैं। प्रश्नकाल के समय बदलने की बात भी की जा रही है। वक़्त आ गया है की तमाम माननीयों को संसद की गरिमा, महत्व और अपनी गंभीरता को समझना होगा।


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