लोकतंत्र का एक स्तम्भ दूसरे को कोसता ज्यादा नज़र आता है। विधायिका न्यायपालिका को और न्यायपालिका अक्सर विधायिका को उसके कर्तव्य और सीमाओं के बारे में जानकारी देती नजर आती है। वैसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया को भी कोसा जाता है। जब सदन की कार्यवाही सुचारू ढंग से ना चले। (जैसा की दुर्भाग्यवश ज्यादातर दिखता भी है। ) तो तुरंत मीडिया को दोषी ठहरा दिया जाता है। वैसे मीडिया जिम्मेदार होती भी है। शोर शराबा और हंगामा मीडिया के लिए मसाले का काम करता है। सदन के बाहर बैठे पत्रकारों का चेहरा खिल जाता है। पूरे दिन बुद्धूबक्से पर वो तसवीरें ही छाईं रहती है और अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर हंगामा सुर्खिया बन चुका होता है। हालाँकि कुछेक अखबार अपने सम्पादकीय में बदलती राजनीती और जनप्रतिनिधि पर चिंता भी जाहिर करते हैं। लेकिन पहला पन्ना शोर शराबे को ही समर्पित होता है। ऐसे में विधायिका की रिपोर्टिंग कैसे की जाये इस पर हर विधानसभा अध्यक्ष अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। हालाँकि कोई बड़ा कदम उठता नहीं दिख सका।
अब राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने एक अच्छी शुरुवात की है। हाल ही में दीपेन्द्र सिंह शेखावत राजस्थान से पत्रकारों के एक समूह के साथ दिल्ली आये। समूह लोक सभा और राज्य सभा कवर करने वाले पत्रकारों से मिले। लोकसभा और राज्यसभा को देखा। संसदीय प्रकिया को करीब से देखा। अपने अनुभव बांटे। राज्य विधायिका की तरफ से इस तरह का कदम शायद पहली बार उठाया गया है। निःसंदेह विधान सभा अध्यक्ष की यह पहल स्वागत योग्य है। राजस्थान से आये पत्रकार इस यात्रा से काफी आशावान है।
मीडिया अगर विधायिका में सकारात्मक रिपोर्टिंग करे तो मौजूदा हालात काफी हद तक बदल सकते है। शोर शराबे और हंगामे की ख़बरों को प्राथमिकता कम देने पर सदन में हंगामा कम होगा? फिलहाल ऐसी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन भरोसे के साथ नहीं। लेकिन यह तो साफ़ है की गंभीर मुद्दों को तरजीह देने के परिणाम सकारात्मक होंगे। जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाले विधायकों को अखबारों में ज्यादा जगह मिलने से वो प्रोत्साहित होंगे। ऐसे में एक माहौल तैयार होगा। जो विधायिका की तस्वीर बेहतर करने में सहायक साबित होगा। साथ ही जनप्रतिनिधियों को भी समझना होगा की वे सदन में चुनकर मीडिया में जगह पाने के लिए नहीं बल्कि सही ढंग से अपनी जनता की समस्या रखने आते है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ट पदाधिकारियों की जिम्मेदारी भी कुछ ज्यादा हो जाती है। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है की अन्य विधानसभा अध्यक्षों को भी मीडिया को लेकर कुछ ऐसी ही पहल करनी होंगी शायद तभी तस्वीर थोड़ी बदल सके।


1 टिप्पणियाँ:
अनुराग जी मीडिया में प्रतिस्पर्धा आपसे छिपी नहीं है। इसी का नतीजा है कि खबरों को सनसनी बनाकर परोसा जाता है। सर्वाधिक टीआरपी और प्रसार का दावा करने वालों के काम भी तो यही है।
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