<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112</id><updated>2011-09-28T15:05:35.558-07:00</updated><title type='text'>पूरी बात</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>13</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-6815171585075462952</id><published>2010-10-01T20:32:00.000-07:00</published><updated>2010-10-01T21:00:55.293-07:00</updated><title type='text'>अशोक भट्ट को श्रदांजली</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/TKatj2tF3wI/AAAAAAAAAHs/s8GDZ1amcPg/s1600/ashok-bhatt1.jpg"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5523292824508161794" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/TKatj2tF3wI/AAAAAAAAAHs/s8GDZ1amcPg/s200/ashok-bhatt1.jpg" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;गुजरात के विधान सभा अध्यक्ष श्री अशोक भट्ट अब नहीं रहे। अशोक भट्ट ने गुजरात महा आन्दोलन से राजनीती की शुरुआत की थी। हालाँकि वो इसे राजनीती नहीं बल्कि समाज सेवा ही मानते थे। उनकी माता जी भी महात्मा गाँधी के साथ स्वाधीनता आन्दोलन में शिरकत कर चुकी थी। श्री भट्ट को आठ बार लगातार विधायक रहने का गौरव प्राप्त था। कई अहम् मंत्रालय संभाल चुके थे। अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी थी। जमीन से जुड़े ऐसे नेता कम ही देखने को मिलते हैं। श्री भट्ट ने विधान सभा से मिले बंगले में रहने से इनकार कर दिया था। अहमदाबाद के भीड़ भाड़ वाले इलाके में रहना ही उन्हें पसंद था, जो उनकी विधान सभा भी थी। इसी जगह से श्री भट्ट ने अपनी राजनीती की शुरुआत की थी। १९७५ से लगातार ३५ साल तक श्री भट्ट ने इस जगह की नुमाइंदगी की। इसी लिए उन्हें खडिया की आत्मा कहा जाता है। सादगी पसंद भट्ट का मकान बहुत ही छोटा सा था। पहली मंजिल पर बने उनके कमरे की लिए लोहे की जीने का सहारा लेना पड़ता था। उनका कमरा बमुश्किल १०-१० का था, जिसमे एक छोटा सा बिस्तर और लोगों के बैठने के लिए बेंच ही समां पाती थी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;अशोक भट्ट ने मुझे बताया था कि कभी वो एक मिल में सफाई का काम किया करते थे। अपनी लगन के बलबूते अशोक भट्ट ने सफाई कर्मी से राजनेता का सफ़र तय किया। विधान सभा अध्यक्ष बने। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;ऐसे राजनेता को मेरी तरफ से श्रदांजलि....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-6815171585075462952?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/6815171585075462952/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=6815171585075462952' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6815171585075462952'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6815171585075462952'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='अशोक भट्ट को श्रदांजली'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/TKatj2tF3wI/AAAAAAAAAHs/s8GDZ1amcPg/s72-c/ashok-bhatt1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-6749733971690042154</id><published>2010-05-07T05:10:00.000-07:00</published><updated>2010-05-07T06:59:08.485-07:00</updated><title type='text'>बजट सत्र 2010 के मायने...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;लोक सभा अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गयी है। तमाम सांसद अपने अपने संसदीय इलाकों का रुख कर चुके होंगे या करने वाले होंगे। जानकार यह पता लगाने में जुटे होंगे कि सत्र कैसा रहा? सांसद भी अपनी सक्रियता और निष्क्रियता की वज़ह तलाशने में व्यस्त होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई पी एल विवाद, फ़ोन टेपिंग, टू जी स्पेक्ट्रुम, मुंबई मोटर मैनों की हड़ताल जैसे मुद्दों की गर्माहट सदन में छाई रही। साथ ही जनप्रतिनिधियों का व्यवहार भी बदलता दिखा। मसलन, भाजपा नेता अनंत कुमार और लालू यादव के बीच की गर्माहट हो या सुदीप बंदोपाध्याय और बासुदेव आचार्य के बीच का विवाद। खुद लोक सभा अध्यक्ष भी बदलते व्यवहार पर नाराज दिखीं। उधर प्रणव दादा भी कुछ सांसदों के व्यवहार पर गुस्से में आग बबूला हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब उठा पटक के बीच २०१० के इस बजट सत्र में कुल 32 बैठकें हुई। इससे पिछले बजट सत्र में कुल बैठकें २६ दिन की थी। इस बार सदन कुल १३७ घंटे चला जबकि पिछली बार लोक सभा में कुल कार्यवाही करीब १६२ घंटे की थी। यानि इस बार बैठकें जरूर ज्यादा रही हों लेकिन कुल घंटे कम हैं। इस बार करीब ७० घंटे शोर शराबे की भेंट चढ़े जबकि पिछली बार सिर्फ २३ घंटे ही सदन की कार्यवाही हंगामे के चलते बर्बाद हुई थी। पिछले बजट सत्र में करीब ३१ घंटे सदन की कार्यवाही ज्यादा चली और जरूरी कामकाज निपटाया गया। हालाँकि इस बार निर्धारित समय के अतिरिक्त सिर्फ १९ घंटे ही ''माननीयों'' ने सदन में बैठना मुनासिब समझा। इसी तरह पिछले बजट सत्र में प्रश्नकाल के दौरान रोज़ औसतन ३.३४ सवाल पूछे गये। इस बार यह आंकड़ा घट कर सिर्फ २.३७ सवाल प्रति दिन पर सिमटा है। इस सत्र में कुल ६२० तारांकित सवाल सूची में दर्ज थे, जिनमे से सिर्फ ७६ के ही जवाब दिए जा सके। पिछले बजट सत्र में ५०० सवाल सूची में दर्ज थे, पूछे गये ८७। बजट सत्र २०१० में कुल २७ विधेयक पेश हुए। २१ विधेयक पारित भी हुए। बजट सत्र २००९ में १६ विधेयक पेश हुए और कुल ८ विधेयक ही पास हो सके। पिछले सत्र में कुल ३० निजी विधेयक पेश हुए थे लेकिन इस बार ४५ निजी विधेयक पेश किये गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लिहाज़ से अगर दोनों सत्रों की तुलना की जाये तो समझ में आता है की इस बार बैठेकें ज्यादा हुई हैं, सरकारी और निजी दोनों विधेयक अपेक्षाकृत ज्यादा पेश हुए हैं और सरकारी विधेयक ज्यादा पारित भी हुए हैं। लेकिन इस बार लोक सभा का समय हंगामे के चलते ज्यादा बर्बाद हुआ है, सवाल कम पूछे गये हैं, अतिरिक्त बैठकें कम हुई हैं और सवाल भी कम पूछे जा सके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तस्वीर बेहतर नहीं कही जा सकती। खुद लोकसभाध्यक्ष भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। प्रश्नकाल बेहतर तरह से चल सके, इसको लेकर लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति दोनों चिंतित हैं। प्रश्नकाल के समय बदलने की बात भी की जा रही है। वक़्त आ गया है की तमाम माननीयों को संसद की गरिमा, महत्व और अपनी गंभीरता को समझना होगा।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-6749733971690042154?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/6749733971690042154/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=6749733971690042154' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6749733971690042154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6749733971690042154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/05/2010.html' title='बजट सत्र 2010 के मायने...'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-1285803075149229364</id><published>2010-05-06T05:07:00.000-07:00</published><updated>2010-05-06T06:07:28.421-07:00</updated><title type='text'>राजनीती का शुद्धिकरण</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S-K-6bnuA2I/AAAAAAAAAHU/xyr2X13-YY4/s1600/maya.bmp"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; FLOAT: right; HEIGHT: 161px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5468142808637244258" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S-K-6bnuA2I/AAAAAAAAAHU/xyr2X13-YY4/s200/maya.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S-K-qEhrzII/AAAAAAAAAHM/-vuzZSwz6fk/s1600/maya.bmp"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;मायावती हमेशा सुर्ख़ियों में रहना जानती हैं। मूर्तियों और पार्कों का निर्माण, सर्वोच्च न्यायालय की दखल, निर्माण पर अलग सुरक्षा व्यवस्था , अलग अलग मुद्दों पर केंद्र से तनातनी लेकिन बाद में कटौती प्रस्ताव पर सरकार को समर्थन। इस सबके बाद मायावती ने अब राजनीती के शुद्धिकरण की राह पकड़ी है। अच्छा है। देर आये दुरुस्त आये तो कहा ही जा सकता है। पार्टी के ऐसे सदस्य जिनका कल अपराध से जुड़ा रहा है। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की शुरुआत की गयी है। तकरीबन ५०० कार्यकर्ताओं को हाल ही में निकाला भी गया। जिन नेताओं पर बाहर निकालने का जिम्मा था...अपराधी पाने पर उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। यानि एक सख्त प्रशासक का उनका पुराना रूप फिर सामने आ रहा है लेकिन इस बार गाज़ अधिकारीयों पर नहीं नेता पर गिरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कुछ सवाल ज़ेहन में हैं। मसलन पूर्ण बहुमत हासिल कर सत्ता में आई मायावती क्या उन विधायकों पर भी गाज़ गिराएंगी? जिनके समर्थन से उनकी सरकार उत्तर प्रदेश में ५ साल पूरे करने का सपना देख रही है। बसपा के कुल २०६ में से ७० विधायकों का इतिहास आपराधिक रहा है। इनमें से कई जेल की हवा खा चुके हैं या खा रहे हैं। यह आंकड़े ADR ने जुटाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधायकों के बाद लाल बत्ती कार में घूमते उन काबीना मंत्रियों पर भी क्या वो ही नियम लागू होंगे जो एक साधारण बसपा कार्यकर्ता पर लागू होते दिख रहे है? २००७ में सत्ता पर काबिज़ होते वक़्त मायावती की कैबिनेट में करीब २ दर्जन आपराधिक छवि के मंत्री थे। इनके अलावा संसद में आये ''माननीयों'' पर भी क्या कुछ सख्त कदम उठेंगे? अगर उनका दामन दागदार रहा है तो...&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इन सबके बीच ख़याल आता है की खुद बसपा सुप्रीमो मायावती भी तो सी बी आई के शिकंजे में हैं। तो क्या वो भी राजनीती से संन्यास???? नहीं- नहीं ऐसा तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि मायावती के लिए दिल्ली अभी दूर है.....और उनके राजनितिक सफ़र की मंजिल भी शायद यही तो है!!!&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-1285803075149229364?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/1285803075149229364/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=1285803075149229364' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/1285803075149229364'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/1285803075149229364'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/05/blog-post_3649.html' title='राजनीती का शुद्धिकरण'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S-K-6bnuA2I/AAAAAAAAAHU/xyr2X13-YY4/s72-c/maya.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-9069295302789448421</id><published>2010-05-05T01:43:00.000-07:00</published><updated>2010-05-05T02:37:05.380-07:00</updated><title type='text'>मीडिया को गंभीर बनाने की पहल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt; लोकतंत्र का एक स्तम्भ दूसरे को कोसता ज्यादा नज़र आता है। विधायिका न्यायपालिका को और न्यायपालिका अक्सर विधायिका को &lt;/span&gt;&lt;span&gt;उसके कर्तव्य और सीमाओं के बारे में जानकारी देती नजर आती है। वैसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया को भी कोसा जाता है। जब सदन की कार्यवाही सुचारू ढंग से ना चले। (जैसा की दुर्भाग्यवश ज्यादातर दिखता भी है। ) &lt;/span&gt;&lt;span&gt;तो तुरंत मीडिया को दोषी ठहरा दिया जाता है। वैसे &lt;/span&gt;&lt;span&gt; मीडिया जिम्मेदार होती भी है। शोर शराबा और हंगामा मीडिया के लिए मसाले का काम करता है। सदन के बाहर बैठे पत्रकारों का चेहरा खिल जाता है। पूरे दिन बुद्धूबक्से पर वो तसवीरें ही छाईं रहती है और अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर हंगामा सुर्खिया बन चुका होता है। हालाँकि कुछेक अखबार अपने सम्पादकीय में बदलती राजनीती और जनप्रतिनिधि पर चिंता भी जाहिर करते हैं। लेकिन पहला पन्ना शोर शराबे को ही समर्पित होता है।  &lt;/span&gt;&lt;span&gt;ऐसे में विधायिका की रिपोर्टिंग कैसे की जाये इस पर हर विधानसभा अध्यक्ष अपनी राय जाहिर &lt;/span&gt;&lt;span&gt; कर चुके हैं। हालाँकि कोई बड़ा कदम उठता नहीं दिख सका। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;अब राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने एक अच्छी शुरुवात की है। हाल ही में दीपेन्द्र सिंह शेखावत राजस्थान से पत्रकारों के एक समूह के साथ दिल्ली आये। समूह लोक सभा और राज्य सभा कवर करने वाले पत्रकारों से मिले। लोकसभा और राज्यसभा को देखा। संसदीय प्रकिया को करीब से देखा। अपने अनुभव बांटे। राज्य विधायिका की तरफ से इस तरह का कदम शायद पहली बार उठाया गया है। निःसंदेह  विधान सभा अध्यक्ष की यह पहल स्वागत योग्य है। राजस्थान से आये पत्रकार इस यात्रा से काफी आशावान है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;मीडिया अगर विधायिका में सकारात्मक रिपोर्टिंग करे तो मौजूदा हालात काफी हद तक बदल सकते है। शोर शराबे और हंगामे की ख़बरों को प्राथमिकता कम देने पर सदन में हंगामा कम होगा? फिलहाल ऐसी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन भरोसे के साथ नहीं। लेकिन यह तो साफ़ है की &lt;/span&gt;&lt;span&gt;गंभीर मुद्दों को तरजीह देने के परिणाम सकारात्मक होंगे। जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाले विधायकों को अखबारों में ज्यादा जगह मिलने से वो प्रोत्साहित होंगे। ऐसे में एक माहौल तैयार होगा। जो विधायिका की तस्वीर बेहतर करने में सहायक साबित होगा। साथ ही जनप्रतिनिधियों  को भी समझना होगा की वे सदन में चुनकर मीडिया में जगह पाने के लिए नहीं बल्कि सही ढंग से अपनी जनता की समस्या रखने आते है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ट पदाधिकारियों की जिम्मेदारी भी कुछ ज्यादा हो जाती है। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है की अन्य विधानसभा अध्यक्षों को भी मीडिया को लेकर कुछ  ऐसी ही पहल करनी होंगी शायद तभी तस्वीर थोड़ी बदल सके। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-9069295302789448421?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/9069295302789448421/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=9069295302789448421' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9069295302789448421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9069295302789448421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मीडिया को गंभीर बनाने की पहल'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-9111153420362265374</id><published>2010-04-15T00:07:00.000-07:00</published><updated>2010-04-15T00:09:52.981-07:00</updated><title type='text'>बस्तर की बदरंग तस्वीर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय पहले मुझे बस्तर संभाग के कांकेर जगदलपुर दंतेवाडा समेत कई जिलों में जाने का मौका मिला। हर जगह एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ दिखा। इंसान इंसान को शक भरी नज़रों से घूरता दिखा। वजह पता थी। नक्सलियों का भय अमूमन सबके चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता था। चार बजे के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पूरी तरह से गायब । बसों की आवाजाही थम जाती है। लोग निजी वाहन से ही कहीं जा सकते हैं वो भी अपनी खुद की जिम्मेदारी पर। ऐसा करते लोग कम ही दिखे। सरकारी वाहन दूर दराज़ के इलाकों में कतई नहीं जाते। &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हमें भी एक थानाध्यक्ष ने जाने से रोका । इस थाने को कुछ साल पहले नक्सलियों ने अपने कब्जे में ले लिया था। हथियार लूट लिए थे। पुलिस का घंटों मुकाबला किया था। उस आतंक की झलक थाने पर अभी भी दिख रही थी। कटीले तारों की हदबंदी, मुस्तैद सुरक्षा जवान और ऊंची ऊंची दीवारों से ढका थाना बहुत कम ही देखने को मिल पता है।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;अपने वरिष्ट अधिकारी से इजाज़त लेने के बाद उन्होंने हमें जाने दिया। ड्राईवर घबराया हुआ था। सड़क से ड्राईवर कार नीचे नहीं उतार सकता था। वजह थी लैंड माइंस के होने का डर। अगर कोई वाहन सामने से आ जाये तो बस मुश्किल सामने। कौन अपना वाहन नीचे उतारें। बहरहाल किसी तरह हम अपने गंतव्य तक पहुंचे- एक सलवा जुडूम के कैंप। कैंप बियावान जंगल में। करीब ८०० लोगों की आबादी और उनकी सुरक्षा पर सीआरपीफ के बामुश्किल करीब ५० लोग तैनात। कैंप से थोड़ी दूरी पर ही दो दिन पहले एक एसपीओ अफसर को नक्सलियों ने दिन दहाड़े बहुत निर्दयता के साथ मार दिया था। कोई कुछ ना कर सका। कैंप में मौजूद लोगों ने अपना दर्द हमारे सामने रखा। कोई पहले नक्सलियों के साथ काम करता था तो कोई मजबूरन उनके अत्याचार सहता रहा है। बातचीत के दौरान कई चौकाने वाली बातें सामने आयी। नक्सलियों को राजनीतिक सहयोग एक बड़ी समस्या रही है, जिसके चलते नक्सलवाद आज भी बस्तर के जंगल में वजूद में है। तभी &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हमारी मुलाकात एक एसपीओ के जवान से हुई। उम्र करीब 23 साल थी। पैरों में हवाई चप्पल और हाथ में ३०९ रायफल। कैंप के बीच से गुजरती जीपों की तलाशी करता दिखा। परिवार की आर्थिक बदहाली के चलते हाथ में बन्दूक उठाने को मजबूर एक ऐसा जवान जो समग्र विकास के नारे से खुद को कोसों दूर पा रहा था। पैसों की खातिर अपनों के खिलाफ बन्दूक उठाने को मजबूर।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;सरकारी तबका मानता हैं की बस्तर में आदिवासियों का शोषण नहीं हुआ है। सिर्फ नक्सली नेता ऐसे ही स्थानीय लोगों में आक्रोश पैदा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन आदिवासियों में इतना गुस्सा भी ऐसे ही नहीं परवान चढ़ सका है। बस्तर संभाग में चिरोंजी बहुतायत में पैदा होती है। वहां के व्यापारी आदिवासियों से चिरोंजी खरीदते थे और उसके बदले उतनी ही मात्रा में नमक दिया करते थे। वस्तु विनिमय की पुरानी परंपरा यहाँ अब तक दिखती रही है। लेकिन चिरोंजी के बदले नमक!!! शायद इस घोर अन्याय का असर नक्सलवाद के तौर पर दिख रहा है....ऐसा माना जा सकता है। मैं यहाँ नक्सल आन्दोलन का समर्थन कतई नहीं करता हूँ। लेकिन जमीनी हालात भी समझने होंगे। आज तस्वीर बदरंग है। अपनों से डरकर लोग शिविरों में रहने को मजबूर हैं। &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;बच्चे टूटी इमारतों में अपना कल सुधारने की जुगत में है। कभी खेलते कूदते पगडंडियों पर चल कर स्कूल जाया करते थे। आज बन्दूक के साए में कलम थामने को मजबूर हैं। एक अध्यापक एक साथ पहली से पांचवी तक के बच्चों को तालीम देते नजर आते हैं। लोग परेशान हैं। नरेगा के तहत काम तो मिलता है लेकिन ना के बराबर। ४२ दिन का औसत रोजगार का आंकड़ा इन शिविरों में और कम हो जाता है।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;जिन्दगी बदहाल है। आदिवासी नक्सलियों से हथियार डालने की अपील करते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है। भले ही उनकी लड़ाई लड़ने का दावा किया जाता हो। लोगों की आँखों में आंसू उनकी व्यथा साफ़ झलकते हैं। उम्मीद है उनके सपने जल्द पूरे होंगे। वो भी इस शिविर रुपी कैद से बाहर निकल कर खुले आसमान में एक कैदी की तरह नहीं बल्कि एक स्वतंत्र नागरिक की तरह जी सकेंगे। इसी उम्मीद में..... &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-9111153420362265374?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/9111153420362265374/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=9111153420362265374' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9111153420362265374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9111153420362265374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_15.html' title='बस्तर की बदरंग तस्वीर'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-8107091146772634837</id><published>2010-04-14T22:52:00.000-07:00</published><updated>2010-04-15T00:45:37.495-07:00</updated><title type='text'>महंगाई - इसकी टोपी उसके सर!!!</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;''महंगाई से निपटने के लिए केंद्र दिखा गंभीर, अलग अलग तीन कमेठियाँ गठित''&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोर ग्रुप की बैठक में यह अहम फैसला लिया गया। कोर ग्रुप की यह पहली बैठक थी। लिहाज़ा इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन यह उपलब्धि आखिर है किसकी? केंद्र की ? राज्यों की ? या फिर आम इंसान की ? बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है। खाद्य मुद्रा स्फीति १७.७ फीसदी के आंकड़े को छु चुकी है। ज़ाहिर है सरकार के सामने मुश्किलें और ज्यादा बढ गयी हैं। ऐसे में कमेटियों के इस गठन के कई पहलू सामने आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;01- संसद में जब विपक्ष महंगाई के मुद्दे को उठाने की कोशिश यह समझाने की होगी कि राज्यों के साथ बात हो चुकी है। कमेटियां गठित कर दी गयी हैं। रिपोर्ट जल्द आने वाली है। उसके आधार पर कदम उठाये जायेंगे। इन तीन कमेटियों में से एक के मुखिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। लिहाज़ा बीजेपी को भी चुप करने की कोशिश की गयी है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;02 - जब तक इन कमेटियों की रिपोर्ट आएगी तब तक रबी की फसल भी आ चुकी होगी। जानकर मानते हैं कि कीमतें खुदबखुद कम हो चुकी होंगी। ऐसे में रिपोर्ट का औचित्य ही नहीं रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;०३- जिन तीन मुद्दों को लेकर कमिटी गठित की गयी हैं। क्या इनपर पहले कोई कमिटी नहीं बनी? कृषि उत्पादन, सार्वजानिक वितरण प्रणाली और उपभोक्ता मामलों पर इस देश में अनेकों कमेटियां बन चुकी हैं। सिफारिशों का ढेर सा लग चूका है। उन सिफारिशों पर क्या सरकार ने कभी कुछ कदम उठाए हैं? अधिकतर पर नहीं। ऐसे में जो सिफारिशें यह कमेटियां देंगी। क्या गारंटी है कि सरकार उनको मानेगी ही?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;०४ - इस पूरी रस्साकशी का आम इंसान को क्या फायदा? मेरे ख़याल में कुछ नहीं। वो पहले भी महंगाई से परेशान था। आज भी है और मौजूदा हालात को देख कर लगता है कि आने वाले दिनों में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक अच्छी बात ज़ेहन में आती है और वो है केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर होते रिश्ते। शायद यह पहला मौका होगा जब केंद्र ने महंगाई जैसे मुद्दे पर राज्यों को साथ लिया हो। भले ही इसके पीछे राजनीती ही हो &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;और vat के बाद यह शायद दूसरा मौका होगा जबकि केंद्र और राज्यों के बीच कोई कमिटी गठित की। vat के परिणाम सकारात्मक दिखे हैं। वजह दोनों के बीच का बेहतर तालमेल मानी जा सकती है। यह एक अच्छी पहल जरूर कही जा सकती है। भले ही इसके नतीजों को लेकर मैं ज्यादा उम्मीदें ना रखता हूँ।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-8107091146772634837?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/8107091146772634837/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=8107091146772634837' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/8107091146772634837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/8107091146772634837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_14.html' title='महंगाई - इसकी टोपी उसके सर!!!'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-8370100399998909877</id><published>2010-04-10T02:30:00.000-07:00</published><updated>2010-04-10T02:48:38.175-07:00</updated><title type='text'>विधानसभाओं में हंगामा: बड़े रोग का छोटा लक्षण</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BIkB7Xp3I/AAAAAAAAAG0/aTPWkWbWP0k/s1600/rajasthan.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; FLOAT: left; HEIGHT: 136px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5458442532202981234" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BIkB7Xp3I/AAAAAAAAAG0/aTPWkWbWP0k/s200/rajasthan.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हाल ही में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दो विधायकों को मार्शलों की मदद से बाहर निकालना पड़ा, वहीं राजस्थान में विधायकों की मार्शलों से भिड़न्त हुई। नतीजा चार विधायकों के चोटिल होने की खबर अखबारों और खब़रिया चैनलों में प्रमुखता से दिखी। कुछ दिन तक चला राजनीतिक ड्रामा आखिरकार समाप्त हुआ। मुख्यमन्त्री के दखल के बाद मामला सुलझा और शान्तिपूर्ण तरीके से सदन चलने की खबर आई। वैसे ये पहली बार नहीं है कि किसी राज्य विधानसभा में इस तरह का मामला सामने आया हो। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण और बाद में शोपिंया काण्ड को लेकर मचे बवाल की झलक लोग देख ही चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इस तरह के शोरशराबे, हंगामे और भिड़न्त के लिए उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले सबके जे़हन में आता है, लेकिन बाकी कई राज्य विधानसभाएं भी इस कतार में खड़ी नज़र आती हैं। बीते साल फरवरी में आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी मार्शल और विधायक आमने-सामने थे। बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की विधायिकाओं में भी जनप्रतिनिधि अपनी ``जिम्मेदारी´´ का एहसास कराते रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;इस तरह की घटनाएं अक्सर सोचने को मजबूर करती हैं। क्या सदन के प्रति जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है? जानकारों का एक बड़ा तबका इस बदलाव की पुष्टि करता है। इस बदलाव की कई वजह हैं। किस तरह के जनप्रतिनिधियों को हम और आप चुनकर राज्य विधानसभाओं में भेज रहे हैं। वर्ष 2008 में पांच राज्यों (दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम) में विधानसभा चुनाव हुआ। गैर सरकारी संगठन `नेशनल इलेक्शन वॉच´ ने 549 विधायकों से प्राप्त हुई जानकारी के आधार पर चौंकाने वाली जानकारी दी। 549 में से 124 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। यानि हर 5 में एक विधायक दागी था। वैसे ये सिर्फ झलक भर है। उत्तर भारत के एक बड़े राज्य के 49 काबीना मन्त्रियों में से 22 मन्त्री हत्या या किसी अन्य संगीन मामले में अदालत के चक्कर लगा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थिति साफ लेकिन चिन्ताजनक है। हत्या, अपहरण, लूट और फिरौती के मामले में दोषी लोग जब विधायक बनेंगे तो विधानसभा में ऐसा होना चौकाने वाला नहीं लगना चाहिए। राजनीति का अपराधीकरण या अपराधीकरण की राजनीति का सवाल पेचीदा हो चला है। हालांकि घोर आशावादी ऐसा नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि देश की 4100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि काफी कम हैं और जनता अपने वोट के प्रति गम्भीर हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपराधीकरण के बाद दूसरी वजह मीडिया की भूमिका को भी माना जाता है। टेलीविजन ने मानों जनप्रतिनिधियों का `कर्तव्य´ ही बदलकर रख दिया है। वैसे अखबार जगत का भी इस कार्य में अहम योगदान है। विधायकों और सांसदों को लगता है कि शोरशराबा, हंगामा और माइक तोड़कर ही सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं। इससे अपने चुनाव क्षेत्र की जनता को अपनी `जिम्मेदारी´ और `कर्तव्य परायणता´ का एहसास कराया जा सकता है। ऐसा होता भी है।&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;चार-पांच घंटे की तैयारी कर चर्चा में भाग लेने वाले जनप्रतिनिधि अगले दिन अखबार में अपना नाम पाने को तरस जाते हैं। अखबारों में ऐसे गम्भीर जनप्रतिनिधियों के लिए स्पेस नहीं होता और ख़बरिया चैनलों की टीआरपी का तो इससे कोई वास्ता ही नहीं है। लिहाजा जनप्रतिनिधि खुद को हतोत्साहित महसूस करता है। जबकि हंगामा, सदन ना चलने देना या मार्शल से भिडन्त मीडिया के लिए मसाले का काम करती है।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;जो जितने भयावह तरीके से ख़बर पेश करता है वो ही शायद सबसे ज्यादा खुद पर इठलाता है। ऐसे में जिम्मेदारी दोनों की है। लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ को अपनी गम्भीरता समझनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ और पहलू भी गौर करने लायक हैं। विधानसभा और संसद की बैठकों की संख्या साल दर साल कमी होती जा रही है। 1952-1961 के बीच संसद की औसतन सालाना बैठक 124 दिन हुआ करती थी। 1992-2001 तक औसतन सालाना बैठक घटकर 81 दिन रह गई। 2008 में संसद की कार्रवाई महज 46 दिन तक चल सकी, जो अभी तक सबसे कम थी। 1988 में आखिरी बार लोकसभा की कार्रवाई 100 दिन से ज्यादा चल सकी थी। वहीं 1974 में राज्यसभा की सालाना बैठक 100 दिन का आंकड़ा आखिरी बार छू सकी थी। ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिकी कांग्रेस में सालभर में आज भी औसतन 140 से 150 दिन सदन चलता है। संसद की कार्रवाई न्यूनतम कितने दिन हो, इसको लेकर भारतीय संविधान में कोई खास उल्लेख नहीं है। बस दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अन्तराल नहीं होना चाहिए। वैसे संसद की कार्रवाई सालभर में कम से कम 100 दिन और विधानसभाओं की बैठक उनकी सीटों की संख्या के आधार पर चले, इस बात पर खासा जोर दिया जाता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा लोकसभाध्यक्ष की कोशिश भी सदन की कार्रवाई कम से कम 100 दिन चलाने की है। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों में भी इस बारे में खासी चर्चा होती रही है। लेकिन कोई सकारात्मक नतीजा नहीं दिख सका है। राजस्थान की 11वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 143 दिन और 12वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 140 दिन ही सदन चल सका है। उत्तराखण्ड में 2007 में कुल 16 जबकि 2008 में कुल 20 बैठकें हुई हैं। कर्नाटक विधानसभा में साल भर में कभी 90 से ज्यादा बैठकें होती थीं, आज आंकड़ा 30 के करीब सिमट चुका है। ये सिर्फ उदाहरण भर हैं। अधिकांश विधानसभाओं की कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा माना जाता है कि यदि सदन ज्यादा दिन चलता है तो विपक्ष के पास अपनी बात रखने का पर्याप्त समय होता है, जो हंगामे को कम करने में मददगार होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में कहा जा सकता है कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही हैं। जिसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सही नहीं कहा जा सकता है। लिहाजा जिम्मेदारी कार्यपालिका की भी है। वैसे एक सवाल विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भी है। जितने दिन सदन चलता है क्या उतने दिन जनप्रतिनिधि सदन के प्रति पर्याप्त समय निकाल पाते हैं? इसके साथ ही गम्भीर मुद्दों और विधेयकों पर चर्चा का समय भी साल दर साल घटता जा रहा है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष की चुनौतियां भी ज्यादा हो जाती हैं। &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;निष्पक्ष रहते हुए सदन की कार्रवाई सुचारू ढंग से चलाना आज के दौर में टेढी खीर साबित हो रहा है। अध्यक्ष की निष्पक्षता भी अक्सर सवालों के घेरे में दिखती है। कहीं ये सवाल काफी हद तक सही भी दिखते हैं और कहीं सिर्फ राजनीति से प्रेरित।&lt;/span&gt; &lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;विधानसभा अध्यक्ष को अपनी मूल पार्टी की बैठकों में शामिल होना चाहिए या नहीं? यह मुद्दा अभी भी चर्चा का विषय है। लेकिन स्पीकर भी मूलत: राजनीतिक दल के नेता होते हैं। पांच साल बाद उन्हें भी अपनी चुनावी वैतरणी पार लगानी होती हैं। लिहाजा वे करें भी तो क्यार्षोर्षो ऐसे में सवाल उठने भी जायज हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में इन घटनाओं को रोकने के लिहाज से कई सुझाव सामने आते हैं। मसलन, विधायकों को सदन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। मीडिया को अपनी गम्भीरता दिखानी होगी। कार्यपालिका को ज्यादा दिन सदन चलाने की कोशिश करनी होगी। जनप्रतिनिधियों का गम्भीर बहस में ज्यादा हिस्सेदारी और सदन में पर्याप्त उपस्थिति का प्रयास हो। गम्भीर भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधि को सदन में प्रोत्साहित और सम्मानित किया जाए। साथ ही `काम नहीं तो वेतन-भत्ता नहीं´ पर विचार हो। राजनीति में अपराधीकरण कम हो और विधानसभा अध्यक्ष को अपनी निष्पक्षता का एहसास हो। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा हो पाना किसी सपने के सच होने के समान है। लेकिन अगर सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती है तो क्या सदन की कोई सकारात्मक तस्वीर आएगीर्षोर्षो क्या तब माइक नहीं टूटेंगे? क्या तब सिर्फ गम्भीर चर्चाएं होगीं? क्या तब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा जनता अपने नेता से उम्मीद रखती है? फिलहाल सिर्फ उम्मीदें रखी जा सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लेख को प्रभासाक्षी.कॉम पर भी देखा जा सकता है। सुझाव जरूर दें।&lt;br /&gt;धन्यवाद।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-8370100399998909877?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/8370100399998909877/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=8370100399998909877' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/8370100399998909877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/8370100399998909877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/04/blog-post_10.html' title='विधानसभाओं में हंगामा: बड़े रोग का छोटा लक्षण'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BIkB7Xp3I/AAAAAAAAAG0/aTPWkWbWP0k/s72-c/rajasthan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-6307034931998883692</id><published>2010-04-05T02:40:00.000-07:00</published><updated>2010-04-10T03:39:31.763-07:00</updated><title type='text'>आरबीआई और किसान</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BSDnZPjLI/AAAAAAAAAG8/sVUnJ8kFaTw/s1600/indiavillager.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; FLOAT: left; HEIGHT: 110px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5458452970440985778" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BSDnZPjLI/AAAAAAAAAG8/sVUnJ8kFaTw/s200/indiavillager.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;भारतीय रिज़र्व बैंक ने हाल ही में अपने ७५ साल पूरे किये हैं। देश भर में इस सिलसिले में कार्यक्रम शुरू किये गये &lt;span style="font-size:0;"&gt;हैं। &lt;/span&gt;बीते इन ७५ सालों में आर बी आई ने ढेरों कदम &lt;span style="font-size:0;"&gt;उठाएं &lt;/span&gt;हैं, लेकिन क्या इन कदमों का लाभ आप इंसान तक पहुँच सका हैं। जाहिर तौर पर इसका जबाव खोजना मुश्किल नहीं। आज भी देश की आबादी का बड़ा हिस्सा बैंकिंग सेवा का लाभ नहीं ले &lt;span style="font-size:0;"&gt;पा &lt;/span&gt;रहा हैं। सवाल &lt;span style="font-size:0;"&gt;उठता &lt;/span&gt;है की क्या देश में छह दशक बाद भी वित्तीय समावेश सही दिशा में हो रहा है या नहीं ? सवाल जायज़ है। देश भर में करीब ६ लाख गाँव हैं। जहाँ देश की तक़रीबन ७० फीसदी आबादी रहती है। लेकिन इसे उनकी बदकिस्मती ही कहा जायेगा कि उनके यहाँ आज भी बैंकिंग सेवाएँ नहीं हैं। ६ लाख में से सिर्फ ३०,००० गांवों में ही &lt;span style="font-size:0;"&gt;बैंको &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;की &lt;/span&gt;शाखाएं मौजूद हैं। यानी देश के सिर्फ पांच फीसदी गांवों में ही किसी बैंक की पहुँच हो सकी है। औसत निकाला जाये तो 20 गांवों के लिए एक शाखा मौजूद है। हालाँकि पूर्वोत्तर इलाकों में तस्वीर और भयावह है। रंगराजन कमिटी के मुताबिक ''पूर्वोत्तर राज्यों के ६४ फीसदी परिवारों को संस्थागत स्रौत से कर्ज नहीं मिलता हैं।'' निजी बैंक अब भी गांवों में जाने से घबरा रहे हैं, अर्थशास्त्र की &lt;span style="font-size:0;"&gt;टर्म &lt;span style="font-size:100%;"&gt;''NPA''&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;हमेशा इसकी एक बड़ी बजह रही है। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जानकार मानते हैं की गाँव की तस्वीर अब बदल रही है। फिर भी बैंक हैं कि मानते ही नहीं। बैंकों के गांवों में ना जाने से तस्वीर काफी बदहाल नज़र आती है। एनएसएसओ (२००४-05) का सर्वे बताता है कि देश के ७३ फीसदी किसान आज भी संस्थागत स्रौत से कर्ज नहीं ले पाते हैं। ४.५० करोड़ किसान परिवार आज भी कहीं से कर्ज नहीं ले पाते हैं और जो २७ फीसदी किसान कर्ज ले भी पाते हैं, उनमें भी एक तिहाई लोग गैर संस्थागत स्रोत से भी कर्ज लेने को मजबूर हैं। वजह साफ़ है बैंक उनकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यही वजह है की &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;१९&lt;/span&gt;९१&lt;/span&gt; से २००२ के बीच साहूकारों से कर्ज लेने वालों की संख्या में भी इजाफा दिखा है। १९९१ में १७.५ फीसदी लोग साहूकारों से क़र्ज़ लेते थे, २००२ में संख्या बढकर २६.८ फीसदी हो गया। यानी जैसे जैसे विकास कि बात ज्यादा हुई किसान साहूकारों कि दलदल में ज्यादा फंसता रहा। नतीजा किसान आत्महत्या को मजबूर होता चला गया। &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;१९९७ से २००७ तक देश भर में एक लाख बयासी हज़ार किसानों ने खुदखुशी का रास्ता चुना। अकेले सिर्क २००७ में देश के १६,632 किसानों ने आत्महत्या की। यानी हर रोज करीब ४५ किसान फांसी का फंदा चुनने को मजबूर हुए। सरकार बेबस दिखी। वहीं मीडिया के कथित समाज सुधारक ऐसी ख़बरों को दिखाकर सर्वश्रेष्ट रिपोर्टर का अवार्ड जीतते रहे।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;बाद में सरकार जागी। किसानों को कर्ज की दलदल से मुक्त करने के मकसद से सरकार कर्ज माफ़ी की योजना के साथ सामने आई। कर्ज का दायरा साल दर साल बढ़ता रहा। बीते वित्त वर्ष में कर्ज प्रवाह के लिए ३,२५,००० करोड़ का प्रावधान रखा। लेकिन सवाल फिर से बैंकों की भूमिका पर उठे। अगस्त २००९ तक खरीफ फसल के लिए कुल कर्ज के ६० फीसदी की दरकार थी, लेकिन कर्ज जारी हुआ सिर्फ ३४ फीसदी। ऐसे में किसान साहूकार के पास क्यों न जाने को मजबूर हो ? नतीजा फिर से कर्ज की दलदल। वैसे बैंकों की ''गंभीरता'' और मुद्दों पर भी दिखती है। मसलन बैंकों की बेरुखी के चलते ट्रक्टर की बिक्री कम हो गयी है। २००८-०९ में ट्रक्टर की बिक्री में ५ फीसदी की कमी देखी गयी है। इस मसले में बैंकों की जिम्मेदारी इस लिए ज्यादा है क्योंकि ९० फीसदी ट्रक्टर की बिक्री बैंकों के जरिये होती है। ऐसे में जानकारों का एक तबका इस बात पार जोर डालने से नहीं चूकता है कि देश में कार खरीदना आसान है, लेकिन ट्रक्टर खरीदना मुश्किल। इसे इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसान क्रेडिट कार्ड इस दिशा में कुछ हद तक सफल रहे हैं, लेकिन तस्वीर यहाँ भी उतनी सुहानी नहीं जितने की दरकार है। वित्त मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में संसद में एक रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट में मुख्यतः केसीसी का ही जिक्र है। समिति ने पाया है की केसीसी के जरिये वितरित कर्ज में कमी आई है। २००५-०६ में केसीसी के जरिये ४७,601 करोड़ का कुल कर्ज वितरित किया गया था, जो २००६-०७ में घट कर ४०,३०० करोड़ ही रह गया। यानि करीब ७हज़ार करोड़ का कर्ज कम दिया गया, जिसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं निकले। इस दरमियाँ करीब ४० फीसदी कार्ड धारक को अपात्र माना गया। समिति ने कहा है की बैंक अपने १८ फीसदी के कर्ज वितरण के अनिवार्य स्तर को पाने में भी नाकाम रहे हैं, ये गंभीर चिंता का विषय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रामीण इलाकों में किसी ज़माने में सहकारी बैंकों का प्रदर्शन काफी बेहतर था, लेकिन अब उनकी हिस्सेदारी में कमी आई है। १९९२ में सहकारी बैंकों की हिस्सेदारी ६२ फीसदी की थी जो आज घट कर २००७ में महज़ ३३ फीसदी पर सिमट चुकी है। हालाँकि रीजनल रुरल बैंक यानि आर आर बी की हिस्सेदारी में काफी इजाफा दिखा है। रंगराजन कमेटी ने माना है की आर आर बी ने कमर्शिअल बैंकों की अपेक्षाकृत बेहतर काम किया है। व्यास कमेटी मानती है की आर आर बी को आर बी आई के दायरे में लाया जाये और उन्हें पूर्ण स्वायत्त दिया जाये, लेकिन अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;खुद रंगराजन साहेब मानते हैं की देश में वित्तीय सेवाओं का विस्तार हुआ हैं, लेकिन दायरे का विस्तार अभी भी उतना नहीं हो सका है, जितने की दरकार है। बीते तीन सालों में बैंकों की शाखाएं खोलने में महज़ 5 फीसदी की वृद्दि देखी गयी है। क्या यह पर्याप्त है? &lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;यू एस में २७२० लोगों पर, ज़र्मनी में १९४५ लोगों पर और जापान में ३९६८ लोगों पर बैंक की एक शाखा मौजूद है, जबकि भारत में करीब १६००० हज़ार लोगों की बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए महज़ एक शाखा है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;देश की महिलाओं की स्थिति तो और ख़राब है। देश भर में बामुश्किल १ करोड़ महिलाएं ही ऐसी हैं, जिनका सरकारी बैंक में खाता है। देश में बैंकिंग सेवा की यह तस्वीर तब ऐसी है, जबकि दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क भारत में है। १९९९ से २००४ के बीच देश के मोबाइल धारकों की संख्या में करीब ६० फीसदी का इजाफा हुआ। लेकिन विस्तार की इतनी ही तेज़ रफ़्तार बैंकिंग सेवा के मामले में बीते ५० सालों में नहीं देखी जा सकी। क्या हमारे देश में रिलायंस मोबाइल के मालिक की सलाह की जरूरत है, जिन्होंने सबके हाथ में मोबाइल देने में अहम भूमिका निभायी या फिर हमें जरूरत बंगलादेश के मुहम्मद युनूस की है, जिन्होंने अपनी योजनाओं को पूरा कर नोबेल पुरुस्कार का सम्मान हासिल किया। मैं यहाँ मुकेश अम्बानी या मुहम्मद युनुस का पी आर नहीं कर रहा हूँ बल्कि यह जताने की कोशिश कर रहा हूँ की सरकार अपने समग्र विकास का सपना तभी पूरा कर सकती हैं जबकि बैंकिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव लाया जाये। इस उम्मीद में सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद है आपको पसंद आया होगा। सुझाव जरूर दें।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;धन्यवाद। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-6307034931998883692?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/6307034931998883692/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=6307034931998883692' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6307034931998883692'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6307034931998883692'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='आरबीआई और किसान'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S8BSDnZPjLI/AAAAAAAAAG8/sVUnJ8kFaTw/s72-c/indiavillager.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-9192609179104756400</id><published>2008-06-11T20:59:00.000-07:00</published><updated>2008-06-12T04:51:09.184-07:00</updated><title type='text'>मीडिया पर साई कृपा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;धर्म आस्था से &lt;span class=""&gt;जुड़ा &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;हर इंसान की &lt;span class=""&gt;आस्था &lt;/span&gt;पर परम्पराएं भी अपना असर छोडती हैं। अक्सर परम्परा और मान्यताएँ &lt;span class=""&gt;धर्म &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;से &lt;/span&gt;जुड़ती हैं। कभी धर्म इनसे मजबूत होता है &lt;span class=""&gt;तो &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;कभी &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;खोखला &lt;/span&gt;लेकिन कुछ मान्यताएँ धर्म से ऊपर होती हैं। कोई धर्म इसमे रोड़ा नही &lt;span class=""&gt;बनता &lt;/span&gt;इसी तरह कुछ ऐसी शक्सियत होती हैं जो धर्म से भी कहीं ऊपर होती हैं। मौजूदा दौर में बाबा रामदेव उन्हीं में से एक हैं। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वैसे &lt;span class=""&gt;साई &lt;/span&gt;बाबा की भी महिमा और प्रसिदी किसी से छुपी नही। सालों से साई अपनी कृपा लाखों भक्तों पर करते रहे हैं। अब बारी इल्क्ट्रोनिक मीडिया यानि &lt;span class=""&gt;बुद्धू &lt;/span&gt;बक्से की है। साई की पूरी कृपा इन दिनों शायद इन्ही पर दिखती है। कुछ दिन पहले मुख्यत दो हिन्दी न्यूज़ चैनल्स पर साई बाबा पर आधारित कार्यक्रम शुरू &lt;span class=""&gt;हुए। &lt;/span&gt;साई की महिमा का बखान बड़े ही रोचक तरीके से किया जाने लगा। जगजीत &lt;span class=""&gt;सिंह &lt;/span&gt;के गाने और ग्राफिक्स के शानदार इस्तेमाल से साई की महिमा में चार चाँद &lt;span class=""&gt;लगाते &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;चैनल्स &lt;/span&gt;में से एक अचानक साई की विडियो भी लेकर पेश हुए। पूरे दिन साई की विडियो चैनल पर चलती रही। बाकी चैनल्स ने जैसे ख़ुद को ठगा सा महसूस &lt;span class=""&gt;किया। &lt;/span&gt;टी आर पी की रेस में ख़ुद को पीछे देखते चैनल्स में अचानक पत्रकारिता &lt;span class=""&gt;जगी। &lt;/span&gt;सबसे &lt;span class=""&gt;पहले &lt;/span&gt;और सबसे तेज़ ख़बर दिखाने वाले चैनल विडियो की हकीकत के साथ सामने &lt;span class=""&gt;आये। &lt;/span&gt;साबित किया &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;विडियो झूठा &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;और दूसरा चैनल लोगों कि आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहा है। धीरे धीरे बाकी चैनल्स को भी अपने वजूद का अहसास हुआ। इस ख़बर पर सब "खेलने" लगे। तेरी कमीज़ मेरी से ज्यादा सफ़ेद &lt;span class=""&gt;कैसे? &lt;/span&gt;इस को लेकर भयंकर घमासान &lt;span class=""&gt;दिखा। &lt;/span&gt;आखिरकार &lt;span class=""&gt;वही &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;हुआ &lt;/span&gt;जो समझदार मीडिया का एक तबका चाहता था। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;इन सबके बीच कुछ सवाल अनसुलझे रह गए। मसलन -&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्या किसी चैनल को लोगों की धार्मिक आस्था से खेलने का हक़ &lt;span class=""&gt;है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्या कोई चैनल किसी &lt;span class=""&gt;वेबसाइट &lt;/span&gt;की विडियो को आधार बना कर ख़बर दिखा सकता है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्या किसी चैनल को दूसरे चैनल की इस तरह भर्त्सना करना जायज़ है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;क्या न्यूज़ चैनल्स के पास ख़बरों के &lt;span class=""&gt;नाम &lt;/span&gt;पर धर्म आधारित कार्यक्रम ही बचे हैं? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अगर हाँ तो न्यूज़ चैनल्स और धार्मिक चैनल्स के बीच अन्तर क्या रहा?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ऐसे कुछ और सबाल जिन का जिक्र करना ठीक न हो लेकिन चैनल्स की इस लड़ाई के बीच साई की कृपा हर चैनल पर टी आर पी के लिहाज़ से तो हो ही गई। वैसे न्यूज़ चैनल्स को और चाहिए भी क्या....&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""  style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अनुराग &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-9192609179104756400?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/9192609179104756400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=9192609179104756400' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9192609179104756400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/9192609179104756400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2008/06/blog-post_8594.html' title='मीडिया पर साई कृपा'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-6296705882318544128</id><published>2008-06-11T01:18:00.000-07:00</published><updated>2008-06-11T22:04:17.437-07:00</updated><title type='text'>राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SE_EAvIeDLI/AAAAAAAAADE/p8_6aSzoGYM/s1600-h/arya.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210598810821987506" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SE_EAvIeDLI/AAAAAAAAADE/p8_6aSzoGYM/s320/arya.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;आर्येंद्र पिछले&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; करीब दो सालों से यूपीए सरकार की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक "राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून" को कवर कर रहे हैं। देश के कई राज्यों में योजना की हकीकत को करीब से देखने के बाद लोगों तक सच्चाई लाने का काम आर्येंद्र ने बखूबी किया है। मेरी गुजारिश पर उन्होंने अपनी राय बेबाकी से रखी हैं। उम्मीद है आप सहमत &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;होंगे।&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून &lt;span class=""&gt;को &lt;/span&gt;लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;कुछ लोग मानते है किये योजना सिर्फ़ घपले घोटाले को बढावा दे रही है जबकि कुछ लोग मानते है कि इस कानून से हालत सुधारे &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;मेरा अपना अनुभव मुझे विवश करता है कि मैं उन लोगों को एक बार टोकूंगा जो इस कानून मे सिर्फ़ खामिया ही देखते है, लोकसभा टेलीविज़न &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;के &lt;/span&gt;लिए कार्यक्रम बनाने के लिए मुझे राजस्थान &lt;span class=""&gt;के &lt;/span&gt;दो जिलो बांसवारा और झालावार जाने का मौका &lt;span class=""&gt;मिला, &lt;/span&gt;जहाँ &lt;span class=""&gt;पर &lt;/span&gt;भ्रष्टाचार के साथ इस कानून को मैंने लोगो की जिंदगी बदलते देखा है, &lt;span class=""&gt;मैं &lt;/span&gt;गवाह &lt;span class=""&gt;हूँ &lt;/span&gt;उन महिलों की आंखों की चमक का, जो नरेगा ने उनकी जिंदगी मे भर दी &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;सोशल ऑडिट जैसे कार्यक्रम ने इस इलाके के लोगो को इतना जागरुक किया है कि लोग &lt;span class=""&gt;मार &lt;/span&gt;खाने के बाद भी अपने हक की लड़ाई के लिए उठ खड़े हुए है, इस प्रकार की शुरुआत ने ग्रामपंचायत स्तर पर लोकतंत्र को जो मजबूती प्रदान की &lt;span class=""&gt;है,&lt;/span&gt; वो काबिले तारीफ है भारत के महालेखा विभाग की रिपोर्ट ने भी इस कानून को लेकर कई सवाल उठाये थे लेकिन उन व्यावहरिक दिकत्तो को कई लोगों &lt;span class=""&gt;ने &lt;/span&gt;बढ़ाचढा कर पेश किया, जबकि ज़मीनी सच्चाई को समझाने की जरूरत है, जॉब कार्ड बनाने से लेकर काम देने तक होने बाले भ्रष्टाचार का खुलासा होते मैंने अपनी आंखो से देखा है मैंने ये भी देखा है कि किस तरह सरपंचो से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक इस गोरख धंधें मे लिप्त &lt;span class=""&gt;थे,&lt;/span&gt; लेकिन इस प्रकार के भ्रष्टाचार का खुलासा होना इस बात की गारंटी है कि आने वाले समय मे ये भ्रष्टाचार कम &lt;span class=""&gt;होंगे,&lt;/span&gt; कियोंकि सोशल ऑडिट के जिस माध्यम से इस प्रकार के खुलासे हो रहे हैं, वो हर ६ महीने पर होता &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;नरेगा पर सवाल उठाने &lt;span class=""&gt;वाले &lt;/span&gt;दोस्तो से मैं ये गुजारिश जरूर करूगा की वो कम से कम एक बार आंध्र प्रदेश जरूर &lt;span class=""&gt;जाए,&lt;/span&gt; नरेगा के सोशल ऑडिट की ताकत का अहसास &lt;span class=""&gt;वहीं &lt;/span&gt;जाकर होगा, आंध्र प्रदेश एकलौता ऐसा प्रदेश &lt;span class=""&gt;है,&lt;/span&gt; जहाँ सोशल ऑडिट के माध्यम से १ करोड़ &lt;span class=""&gt;रुपये &lt;/span&gt;से भी &lt;span class=""&gt;ज्यादा &lt;/span&gt;की रिकवरी हुई है, मैं ये नहीं कहता की &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;नरेगा ने ग्रामीण हिंदुस्तान की तस्वीर बदल दी है लेकिन जिन सच्चाइयों से मैं आंध्र प्रदेश के करीमनगर जिले मे &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;रूबरू हुआ हूँ वो वास्तव मे अचरज मे भरी है, उस &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;नक्सली इलाके मे नरेगा ने जिस प्रकार से सरकारी उपस्तिथि दर्ज करी है वो &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;शायद पहली बार है &lt;span class=""&gt;कियोंकि नक्सली &lt;/span&gt;सरकारी योजनाओ को अपने इलाके मे पनपने &lt;span class=""&gt;ही &lt;/span&gt;नही &lt;span class=""&gt;देते, &lt;/span&gt;लेकिन नरेगा इस मामले मे सबसे अलग साबित हुई है, कुल मिलाकर मैं बहुत सी सुधरती चीजो को देख रहा हूँ जो नरेगा के द्वारा हो रही है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;इन्ही उम्मीदों के साथ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;आर्येंद्र प्रताप&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-6296705882318544128?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/6296705882318544128/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=6296705882318544128' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6296705882318544128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6296705882318544128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2008/06/blog-post_11.html' title='राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SE_EAvIeDLI/AAAAAAAAADE/p8_6aSzoGYM/s72-c/arya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-2430043632635385132</id><published>2008-06-06T00:12:00.001-07:00</published><updated>2008-06-09T22:13:48.981-07:00</updated><title type='text'>हिमाचल और हिंदुस्तान</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SEjjqvLx3wI/AAAAAAAAACs/YC--YBiHKnc/s1600-h/16.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208663292413861634" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SEjjqvLx3wI/AAAAAAAAACs/YC--YBiHKnc/s200/16.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हाल ही में हिमाचल प्रदेश विधान सभा कवर करने का मौका &lt;span class=""&gt;मिला। &lt;/span&gt;सूबे की राजनीति को थोड़ा करीब से समझने की कोशिश की। हालांकि राजनीति के खेल को समझना टेडी खीर माना जाता है। इस लिहाज़ से ये मेरे लिए भी कठिन काम था। &lt;span class=""&gt;बहरहाल,&lt;/span&gt; विधानसभा में जन प्रतिनिधिओं की भूमिका किस तरह की &lt;span class=""&gt;है? &lt;/span&gt;इस मसले पर &lt;span class=""&gt;मैंने &lt;/span&gt;हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष तुलसी राम से बातचीत की। हिमाचल की राजनीति से पहले बात तुलसीराम जी की। तुलसी राम जी भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, जो चम्बा जिले &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;भरमौर सीट से तीसरी बार विधायक हैं। किसान परिवार में जन्मे तुलसी राम का लगाव खेती से है। बागवानी के शौकीन तुलसी राम अपने व्यस्त जीवन में काफी वक़्त फूलों के रखरखाव को देते &lt;span class=""&gt;हैं। &lt;/span&gt;संघर्ष उनके जीवन का अहम् हिस्सा रहा है। बचपन से ही तुलसीराम का निजी जीवन बड़ा ही उठापटक भरा रहा। बचपन में ही उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया। &lt;span class=""&gt;बतौर &lt;/span&gt;विधायक राजनितिक करिअर की शुरुआत होने से ठीक पहले उनकी पत्नी का भी आकस्मिक निधन हो गया। तुलसीराम पूरी तरह टूट चुके &lt;span class=""&gt;थे, &lt;/span&gt;लेकिन उन्होनें हार नही &lt;span class=""&gt;मानी। &lt;/span&gt;हाल ही सूबे में हुए चुनाव उन्हें तीसरी बार जीतने का &lt;span class=""&gt;मौका &lt;/span&gt;मिला। इस बार जिम्मेदारी ज्यादा मिली। उन्हें निर्विरोध तरीके से बतौर हिमाचल प्रदेश विधान चुना गया। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;वैसे विधानसभा&lt;/span&gt; का इतिहास बड़ा ही रोचक &lt;span class=""&gt;रहा,&lt;/span&gt; ब्रिटिश राज में मुल्क की राजधानी रहे शिमला में काउंसिल चैंबर की दरकार महसूस हुई। लिहाज़ा १९२० में इस भवन का निर्माण शुरू &lt;span class=""&gt;हुआ &lt;/span&gt;जो करीब ५ साल तक चला। उस ज़माने में करीब १० लाख की लागत से बनी ये इमारत ब्रिटिश हुकूमत की आखिरी &lt;span class=""&gt;इमारतों &lt;/span&gt;में से एक है। उस ज़माने की कौंसिल चैंबर आज की विधानसभा है। मौजूदा दौर में हिमाचल में ६८ विधानसभा सीटें &lt;span class=""&gt;हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;इन सबके बीच जो बात अहम् थी वो था वहां की राजनीती का &lt;span class=""&gt;स्तर। &lt;/span&gt;तुलसी राम ने बताया की शोरशराबा हिमाचल की राजनीती का हिस्सा कभी नही रहा। वाकआउट या विरोध प्रदर्शन हिमाचल विधान सभा में बमुश्किल ही देखने को मिलता है। स्पीकर का साफ तौर पर मानना था की जनप्रतिनिधि विधानसभा में मुद्दों को लेकर गंभीर नजर आते हैं। हर मसले पर सार्थक चर्चा होती है। हर मसला सिर्फ़ राजनीती से जोड़ कर नही देखा जाता। स्पीकर ऐसे माहौल से सतुन्ष्ट नजर आते हैं। ये सब सुनके मुझे देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था लोकसभा का ख्याल &lt;span class=""&gt;आया,&lt;/span&gt;जहाँ हंगामा सदन की कार्यवाही का एक हिस्सा नजर आने लगा है। शोरशराबा संसद का प्रतीक बनता जा रहा है। जनता साफतौर पर मानती है की &lt;span class=""&gt;संसद &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;में &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;काम &lt;/span&gt;नही हंगामा होता है और जनता का पैसा घटिया &lt;span class=""&gt;राजनीती &lt;/span&gt;के चलते बरबाद होता है। जनप्रतिनिधि अपनी जनता के प्रति &lt;span class=""&gt;कितने &lt;/span&gt;गंभीर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से साफ पता चलता है। ऐसे में लोक सभा स्पीकर करें &lt;span class=""&gt;भी &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;क्या? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;अक्सर &lt;/span&gt;सांसदों को सख्त &lt;span class=""&gt;हिदायत &lt;/span&gt;देते स्पीकर अक्सर लाचार से नजर आते है। ऐसे में उम्मीद है की लोकसभा में बैठे कुछ सांसद जो &lt;span class=""&gt;सदन,&lt;/span&gt;राजनीती और मुल्क की एक अलग छवि पेश करने में जुटे &lt;span class=""&gt;हैं, &lt;/span&gt;उन्हें अक्ल &lt;span class=""&gt;आएगी &lt;/span&gt;और लोकसभा भी हिमाचल विधानसभा की तरह नजर आएगा। लेकिन ऐसा मुमकिन कब होगा ये कहना शायद हर राजनेता के &lt;span class=""&gt;लिए &lt;/span&gt;मुश्किल काम &lt;span class=""&gt;होगा,&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;मेरे लिए और ज्यादा &lt;span class=""&gt;कठिन। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;वैसे लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने कई अहम् सुझाव दिए है, मसलन कम &lt;span class=""&gt;नही-&lt;/span&gt;पैसा &lt;span class=""&gt;नहीं &lt;/span&gt;और जनता की अपेक्षा पर खरा न उतरने वाले सांसद को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिया &lt;span class=""&gt;जाए &lt;/span&gt;यानि राइट टू रीकाल. ऐसे में अगर इन सुझावों पर ध्यान दिया जाए तो यकीनन आने वाले दिनों में हिमाचल जैसी राजनीती हिंदुस्तान की भी होगी.... हालांकि राजनितिक स्वार्थौं की बहुलता के चलते ऐसा मुश्किल ही दिखता है. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अनुराग&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-2430043632635385132?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/2430043632635385132/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=2430043632635385132' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/2430043632635385132'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/2430043632635385132'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2008/06/blog-post_06.html' title='हिमाचल और हिंदुस्तान'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SEjjqvLx3wI/AAAAAAAAACs/YC--YBiHKnc/s72-c/16.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-4386007552747747227</id><published>2008-06-05T19:53:00.000-07:00</published><updated>2008-06-09T22:12:57.894-07:00</updated><title type='text'>अग्रज ओमप्रकाश...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ओमप्रकाश&lt;/span&gt;.....&lt;/span&gt;ये नाम मेरे सहयोगी और युवा पत्रकार का है। ब्लॉग जगत में मेरे प्रवेश की बड़ी बजह ओमप्रकाश यानि ओ पी ही हैं. अक्सर कुछ नया करने वाले ओमप्रकाश सबको प्रभावित करते रहे हैं। मैं भी उन्ही में से एक &lt;span class=""&gt;हूँ। वैसे &lt;/span&gt;महिमा मंडन बड़ा ही आसान काम माना जाता रहा है लेकिन मुझे काफी मुश्किल होती है। ऐसे में मेरी कोशिश उनके बारे में सिर्फ़ सच बताने की ही होगी। लोक सभा टीवी में पिछले करीब दो सालों से बतौर एंकर काम कर रहे ओपी के साथ काम करने का मुझे काफी मौका मिला। अक्सर कुछ हटके और पहले करने की उनकी आदत ने काफी कुछ सिखाया। ना सिर्फ़ मुझे बल्कि मेरे कई और साथियों को भी।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;बिहार से ताल्लुक वाले ओपी की राजनीति और व्यापार पर अच्छी पकड़ लंबे अरसे से रही है। इसके अलावा भी कई मसलों पर ओपी ने कई शानदार कार्यकम पेश किए हैं, वो भी सीमित संसाधनों में। ४० साल नक्सलवाद, केंद्रीय बजट, रेल बजट, ग्लोबल वार्मिंग, जूनून क्रिकेट का, नई राजनीति जैसे कई मुद्दों पर ओपी ने अपनी राय बेबाकी से रखी। उम्मीद है कि वो अपनी रचनात्मकता से हमें आगे भी कुछ न कुछ सिखाते रहेंगे। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;ऐसे अग्रज को कोटी कोटी प्रणाम...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;अनुराग &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-4386007552747747227?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/4386007552747747227/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=4386007552747747227' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/4386007552747747227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/4386007552747747227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2008/06/blog-post_05.html' title='अग्रज ओमप्रकाश...'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5117890876412596112.post-6633725396169471677</id><published>2008-06-04T22:40:00.000-07:00</published><updated>2008-06-09T22:11:06.841-07:00</updated><title type='text'>युवाओं का देश</title><content type='html'>&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SE4LNzUv2WI/AAAAAAAAAC8/aU8LXpVBqPs/s1600-h/yuva.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5210114150657677666" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_0J6v7g82nFM/SE4LNzUv2WI/AAAAAAAAAC8/aU8LXpVBqPs/s320/yuva.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;हाल ही में सयुंक्त राष्ट्र संघ ने वर्ल्ड यूथ रिपोर्ट जारी &lt;span class=""&gt;की, &lt;/span&gt;जिसमें न सिर्फ़ इस मुल्क के बल्कि पूरी दुनिया के युवाओं का जिक्र है। ये रिपोर्ट दुनिया भर के युवाओं की तस्वीर सामने रखती है। यहाँ ये भी साफ कर दे &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;सयुंक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक युवाओं कि उम्र १५ से २४ साल &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में युवाओं की संख्या करीब एक अरब है। यानी हर पाँच में से एक युवा है। इन नौजवानों की तादात &lt;span class=""&gt;विकासशील &lt;/span&gt;देशों में कहीं जयादा है। &lt;span class=""&gt;मतलब &lt;/span&gt;साफ है कि हिंदुस्तान में युवाओं की कमी नहीं। इस रिपोर्ट में जहाँ कई आंकडें चौकानें वाले हैं वहीं कुछ राहत भी देते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मसलन ११५ मिलियन बच्चे आज भी प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। इनमे ५७ फीसदी लड़कियां हैं। &lt;span class=""&gt;स्वास्थ्य &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;तस्वीर भी बेहतर नही है। एचआईवी एड्स महामारी के &lt;span class=""&gt;तौर &lt;/span&gt;पर &lt;span class=""&gt;देखी &lt;/span&gt;जा रही &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;हर १४ सेकंड में एक युवा एच आई वी का शिकार हो रहा है। गरीबी विकास में भी रोड़ा बन रही है। दुनियाभर के नौजवानों की आबादी का १८ फीसदी हिस्सा रोजाना एक डॉलर से भी कम में जिन्दगी जीने को मजबूर है। यह तस्वीर पूरी दुनिया की है। वैसे इन आंकडों असर हमारे मुल्क में न &lt;span class=""&gt;हो, &lt;/span&gt;ये मुमकिन नही। हिंदुस्तान में युवाओं की तादात काफी ज्यादा है। बाजार इन्ही के लिए सजे &lt;span class=""&gt;हैं। &lt;/span&gt;उत्पादों पर छूट इन्हीं के लिए है। सबका मकसद इन्हीं युवाओं को अपनी और खीचने का है। युवाओं के पास भी अचानक पैसा आ गया है। कैश न सही क्रेडिट कार्ड ही सही। पूरी दुनिया को अपने कब्जे में करने की चाह पैसा खर्च करने को मजबूर करती है। रियल इस्टेट से लेकर रीटेल सेक्टर तक हर बदलाव युवाओं के लिये ही है&lt;span class=""&gt;। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class=""&gt;इन सबकेबीच&lt;/span&gt; युवाओं से जुड़े इन मसले ऐसे भी हैं जो गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हैं &lt;span class=""&gt;।शिक्षा से लेकर &lt;/span&gt;रोजगार पाने की जद्दोजद युवाओं को कितना और कहाँ तक &lt;span class=""&gt;तोड़ती &lt;span class=""&gt;है, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;ये देखने वाला कोई नहीं. निराशा युवाओं को खोखला कर रही है। पिछले कुछ सालों में नौजवानों में बड़ते खुद्खुशी के मामले इसी और इशारा करते हैं। दरअसल जब सपने सच नही होते तो कुंठा जन्म लेती &lt;span class=""&gt;है। &lt;/span&gt;कभी ये कुंठा ख़ुद को मारने पर मजबूर करती है तो कभी दूसरो को।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;इन सबके &lt;span class=""&gt;बीच &lt;/span&gt;हमारे आसपास की दुनिया कुछ आधुनिक सी हो गयी लगती है&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; जिसमें परम्पराएं भी हैं लेकिन सकुचाई हुई सी। संस्कृति भी है पर सहमी हुई &lt;span class=""&gt;सी। &lt;/span&gt;आजादी के मूल्य भले ही थोड़े धुन्दले दिखाते हो या राष्ट्रीय पर्व महज़ औपचारिकता दिखते हों। पर युवा आज भी अपने मुल्क को उसी जज्बे से प्यार करता है जो सपना मुल्क के &lt;span class=""&gt;पुरोधाओं ने&lt;/span&gt; देखा था। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अनुराग &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5117890876412596112-6633725396169471677?l=pooribaat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pooribaat.blogspot.com/feeds/6633725396169471677/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5117890876412596112&amp;postID=6633725396169471677' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6633725396169471677'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5117890876412596112/posts/default/6633725396169471677'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pooribaat.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='युवाओं का देश'/><author><name>अनुराग दीक्षित</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16900128788183214722</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://1.bp.blogspot.com/_0J6v7g82nFM/S712R2wqttI/AAAAAAAAAF4/RsGbMecc7M0/S220/01.jpg'/></author><media:thumbnail 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