शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

अशोक भट्ट को श्रदांजली


गुजरात के विधान सभा अध्यक्ष श्री अशोक भट्ट अब नहीं रहे। अशोक भट्ट ने गुजरात महा आन्दोलन से राजनीती की शुरुआत की थी। हालाँकि वो इसे राजनीती नहीं बल्कि समाज सेवा ही मानते थे। उनकी माता जी भी महात्मा गाँधी के साथ स्वाधीनता आन्दोलन में शिरकत कर चुकी थी। श्री भट्ट को आठ बार लगातार विधायक रहने का गौरव प्राप्त था। कई अहम् मंत्रालय संभाल चुके थे। अब अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी थी। जमीन से जुड़े ऐसे नेता कम ही देखने को मिलते हैं। श्री भट्ट ने विधान सभा से मिले बंगले में रहने से इनकार कर दिया था। अहमदाबाद के भीड़ भाड़ वाले इलाके में रहना ही उन्हें पसंद था, जो उनकी विधान सभा भी थी। इसी जगह से श्री भट्ट ने अपनी राजनीती की शुरुआत की थी। १९७५ से लगातार ३५ साल तक श्री भट्ट ने इस जगह की नुमाइंदगी की। इसी लिए उन्हें खडिया की आत्मा कहा जाता है। सादगी पसंद भट्ट का मकान बहुत ही छोटा सा था। पहली मंजिल पर बने उनके कमरे की लिए लोहे की जीने का सहारा लेना पड़ता था। उनका कमरा बमुश्किल १०-१० का था, जिसमे एक छोटा सा बिस्तर और लोगों के बैठने के लिए बेंच ही समां पाती थी।
अशोक भट्ट ने मुझे बताया था कि कभी वो एक मिल में सफाई का काम किया करते थे। अपनी लगन के बलबूते अशोक भट्ट ने सफाई कर्मी से राजनेता का सफ़र तय किया। विधान सभा अध्यक्ष बने।

ऐसे राजनेता को मेरी तरफ से श्रदांजलि....

शुक्रवार, 7 मई 2010

बजट सत्र 2010 के मायने...

लोक सभा अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गयी है। तमाम सांसद अपने अपने संसदीय इलाकों का रुख कर चुके होंगे या करने वाले होंगे। जानकार यह पता लगाने में जुटे होंगे कि सत्र कैसा रहा? सांसद भी अपनी सक्रियता और निष्क्रियता की वज़ह तलाशने में व्यस्त होंगे।

आई पी एल विवाद, फ़ोन टेपिंग, टू जी स्पेक्ट्रुम, मुंबई मोटर मैनों की हड़ताल जैसे मुद्दों की गर्माहट सदन में छाई रही। साथ ही जनप्रतिनिधियों का व्यवहार भी बदलता दिखा। मसलन, भाजपा नेता अनंत कुमार और लालू यादव के बीच की गर्माहट हो या सुदीप बंदोपाध्याय और बासुदेव आचार्य के बीच का विवाद। खुद लोक सभा अध्यक्ष भी बदलते व्यवहार पर नाराज दिखीं। उधर प्रणव दादा भी कुछ सांसदों के व्यवहार पर गुस्से में आग बबूला हुए।

इन सब उठा पटक के बीच २०१० के इस बजट सत्र में कुल 32 बैठकें हुई। इससे पिछले बजट सत्र में कुल बैठकें २६ दिन की थी। इस बार सदन कुल १३७ घंटे चला जबकि पिछली बार लोक सभा में कुल कार्यवाही करीब १६२ घंटे की थी। यानि इस बार बैठकें जरूर ज्यादा रही हों लेकिन कुल घंटे कम हैं। इस बार करीब ७० घंटे शोर शराबे की भेंट चढ़े जबकि पिछली बार सिर्फ २३ घंटे ही सदन की कार्यवाही हंगामे के चलते बर्बाद हुई थी। पिछले बजट सत्र में करीब ३१ घंटे सदन की कार्यवाही ज्यादा चली और जरूरी कामकाज निपटाया गया। हालाँकि इस बार निर्धारित समय के अतिरिक्त सिर्फ १९ घंटे ही ''माननीयों'' ने सदन में बैठना मुनासिब समझा। इसी तरह पिछले बजट सत्र में प्रश्नकाल के दौरान रोज़ औसतन ३.३४ सवाल पूछे गये। इस बार यह आंकड़ा घट कर सिर्फ २.३७ सवाल प्रति दिन पर सिमटा है। इस सत्र में कुल ६२० तारांकित सवाल सूची में दर्ज थे, जिनमे से सिर्फ ७६ के ही जवाब दिए जा सके। पिछले बजट सत्र में ५०० सवाल सूची में दर्ज थे, पूछे गये ८७। बजट सत्र २०१० में कुल २७ विधेयक पेश हुए। २१ विधेयक पारित भी हुए। बजट सत्र २००९ में १६ विधेयक पेश हुए और कुल ८ विधेयक ही पास हो सके। पिछले सत्र में कुल ३० निजी विधेयक पेश हुए थे लेकिन इस बार ४५ निजी विधेयक पेश किये गये हैं।

इस लिहाज़ से अगर दोनों सत्रों की तुलना की जाये तो समझ में आता है की इस बार बैठेकें ज्यादा हुई हैं, सरकारी और निजी दोनों विधेयक अपेक्षाकृत ज्यादा पेश हुए हैं और सरकारी विधेयक ज्यादा पारित भी हुए हैं। लेकिन इस बार लोक सभा का समय हंगामे के चलते ज्यादा बर्बाद हुआ है, सवाल कम पूछे गये हैं, अतिरिक्त बैठकें कम हुई हैं और सवाल भी कम पूछे जा सके हैं।

तस्वीर बेहतर नहीं कही जा सकती। खुद लोकसभाध्यक्ष भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। प्रश्नकाल बेहतर तरह से चल सके, इसको लेकर लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति दोनों चिंतित हैं। प्रश्नकाल के समय बदलने की बात भी की जा रही है। वक़्त आ गया है की तमाम माननीयों को संसद की गरिमा, महत्व और अपनी गंभीरता को समझना होगा।

बृहस्पतिवार, 6 मई 2010

राजनीती का शुद्धिकरण





मायावती हमेशा सुर्ख़ियों में रहना जानती हैं। मूर्तियों और पार्कों का निर्माण, सर्वोच्च न्यायालय की दखल, निर्माण पर अलग सुरक्षा व्यवस्था , अलग अलग मुद्दों पर केंद्र से तनातनी लेकिन बाद में कटौती प्रस्ताव पर सरकार को समर्थन। इस सबके बाद मायावती ने अब राजनीती के शुद्धिकरण की राह पकड़ी है। अच्छा है। देर आये दुरुस्त आये तो कहा ही जा सकता है। पार्टी के ऐसे सदस्य जिनका कल अपराध से जुड़ा रहा है। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की शुरुआत की गयी है। तकरीबन ५०० कार्यकर्ताओं को हाल ही में निकाला भी गया। जिन नेताओं पर बाहर निकालने का जिम्मा था...अपराधी पाने पर उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। यानि एक सख्त प्रशासक का उनका पुराना रूप फिर सामने आ रहा है लेकिन इस बार गाज़ अधिकारीयों पर नहीं नेता पर गिरी है।

लेकिन कुछ सवाल ज़ेहन में हैं। मसलन पूर्ण बहुमत हासिल कर सत्ता में आई मायावती क्या उन विधायकों पर भी गाज़ गिराएंगी? जिनके समर्थन से उनकी सरकार उत्तर प्रदेश में ५ साल पूरे करने का सपना देख रही है। बसपा के कुल २०६ में से ७० विधायकों का इतिहास आपराधिक रहा है। इनमें से कई जेल की हवा खा चुके हैं या खा रहे हैं। यह आंकड़े ADR ने जुटाए हैं।

विधायकों के बाद लाल बत्ती कार में घूमते उन काबीना मंत्रियों पर भी क्या वो ही नियम लागू होंगे जो एक साधारण बसपा कार्यकर्ता पर लागू होते दिख रहे है? २००७ में सत्ता पर काबिज़ होते वक़्त मायावती की कैबिनेट में करीब २ दर्जन आपराधिक छवि के मंत्री थे। इनके अलावा संसद में आये ''माननीयों'' पर भी क्या कुछ सख्त कदम उठेंगे? अगर उनका दामन दागदार रहा है तो...

इन सबके बीच ख़याल आता है की खुद बसपा सुप्रीमो मायावती भी तो सी बी आई के शिकंजे में हैं। तो क्या वो भी राजनीती से संन्यास???? नहीं- नहीं ऐसा तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि मायावती के लिए दिल्ली अभी दूर है.....और उनके राजनितिक सफ़र की मंजिल भी शायद यही तो है!!!

बुधवार, 5 मई 2010

मीडिया को गंभीर बनाने की पहल

लोकतंत्र का एक स्तम्भ दूसरे को कोसता ज्यादा नज़र आता है। विधायिका न्यायपालिका को और न्यायपालिका अक्सर विधायिका को उसके कर्तव्य और सीमाओं के बारे में जानकारी देती नजर आती है। वैसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया को भी कोसा जाता है। जब सदन की कार्यवाही सुचारू ढंग से ना चले। (जैसा की दुर्भाग्यवश ज्यादातर दिखता भी है। ) तो तुरंत मीडिया को दोषी ठहरा दिया जाता है। वैसे मीडिया जिम्मेदार होती भी है। शोर शराबा और हंगामा मीडिया के लिए मसाले का काम करता है। सदन के बाहर बैठे पत्रकारों का चेहरा खिल जाता है। पूरे दिन बुद्धूबक्से पर वो तसवीरें ही छाईं रहती है और अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर हंगामा सुर्खिया बन चुका होता है। हालाँकि कुछेक अखबार अपने सम्पादकीय में बदलती राजनीती और जनप्रतिनिधि पर चिंता भी जाहिर करते हैं। लेकिन पहला पन्ना शोर शराबे को ही समर्पित होता है। ऐसे में विधायिका की रिपोर्टिंग कैसे की जाये इस पर हर विधानसभा अध्यक्ष अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। हालाँकि कोई बड़ा कदम उठता नहीं दिख सका।
अब राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने एक अच्छी शुरुवात की है। हाल ही में दीपेन्द्र सिंह शेखावत राजस्थान से पत्रकारों के एक समूह के साथ दिल्ली आये। समूह लोक सभा और राज्य सभा कवर करने वाले पत्रकारों से मिले। लोकसभा और राज्यसभा को देखा। संसदीय प्रकिया को करीब से देखा। अपने अनुभव बांटे। राज्य विधायिका की तरफ से इस तरह का कदम शायद पहली बार उठाया गया है। निःसंदेह विधान सभा अध्यक्ष की यह पहल स्वागत योग्य है। राजस्थान से आये पत्रकार इस यात्रा से काफी आशावान है।
मीडिया अगर विधायिका में सकारात्मक रिपोर्टिंग करे तो मौजूदा हालात काफी हद तक बदल सकते है। शोर शराबे और हंगामे की ख़बरों को प्राथमिकता कम देने पर सदन में हंगामा कम होगा? फिलहाल ऐसी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन भरोसे के साथ नहीं। लेकिन यह तो साफ़ है की गंभीर मुद्दों को तरजीह देने के परिणाम सकारात्मक होंगे। जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाले विधायकों को अखबारों में ज्यादा जगह मिलने से वो प्रोत्साहित होंगे। ऐसे में एक माहौल तैयार होगा। जो विधायिका की तस्वीर बेहतर करने में सहायक साबित होगा। साथ ही जनप्रतिनिधियों को भी समझना होगा की वे सदन में चुनकर मीडिया में जगह पाने के लिए नहीं बल्कि सही ढंग से अपनी जनता की समस्या रखने आते है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ट पदाधिकारियों की जिम्मेदारी भी कुछ ज्यादा हो जाती है। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है की अन्य विधानसभा अध्यक्षों को भी मीडिया को लेकर कुछ ऐसी ही पहल करनी होंगी शायद तभी तस्वीर थोड़ी बदल सके।

बृहस्पतिवार, 15 अप्रैल 2010

बस्तर की बदरंग तस्वीर



कुछ समय पहले मुझे बस्तर संभाग के कांकेर जगदलपुर दंतेवाडा समेत कई जिलों में जाने का मौका मिला। हर जगह एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ दिखा। इंसान इंसान को शक भरी नज़रों से घूरता दिखा। वजह पता थी। नक्सलियों का भय अमूमन सबके चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता था। चार बजे के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पूरी तरह से गायब । बसों की आवाजाही थम जाती है। लोग निजी वाहन से ही कहीं जा सकते हैं वो भी अपनी खुद की जिम्मेदारी पर। ऐसा करते लोग कम ही दिखे। सरकारी वाहन दूर दराज़ के इलाकों में कतई नहीं जाते।
हमें भी एक थानाध्यक्ष ने जाने से रोका । इस थाने को कुछ साल पहले नक्सलियों ने अपने कब्जे में ले लिया था। हथियार लूट लिए थे। पुलिस का घंटों मुकाबला किया था। उस आतंक की झलक थाने पर अभी भी दिख रही थी। कटीले तारों की हदबंदी, मुस्तैद सुरक्षा जवान और ऊंची ऊंची दीवारों से ढका थाना बहुत कम ही देखने को मिल पता है।
अपने वरिष्ट अधिकारी से इजाज़त लेने के बाद उन्होंने हमें जाने दिया। ड्राईवर घबराया हुआ था। सड़क से ड्राईवर कार नीचे नहीं उतार सकता था। वजह थी लैंड माइंस के होने का डर। अगर कोई वाहन सामने से आ जाये तो बस मुश्किल सामने। कौन अपना वाहन नीचे उतारें। बहरहाल किसी तरह हम अपने गंतव्य तक पहुंचे- एक सलवा जुडूम के कैंप। कैंप बियावान जंगल में। करीब ८०० लोगों की आबादी और उनकी सुरक्षा पर सीआरपीफ के बामुश्किल करीब ५० लोग तैनात। कैंप से थोड़ी दूरी पर ही दो दिन पहले एक एसपीओ अफसर को नक्सलियों ने दिन दहाड़े बहुत निर्दयता के साथ मार दिया था। कोई कुछ ना कर सका। कैंप में मौजूद लोगों ने अपना दर्द हमारे सामने रखा। कोई पहले नक्सलियों के साथ काम करता था तो कोई मजबूरन उनके अत्याचार सहता रहा है। बातचीत के दौरान कई चौकाने वाली बातें सामने आयी। नक्सलियों को राजनीतिक सहयोग एक बड़ी समस्या रही है, जिसके चलते नक्सलवाद आज भी बस्तर के जंगल में वजूद में है। तभी
हमारी मुलाकात एक एसपीओ के जवान से हुई। उम्र करीब 23 साल थी। पैरों में हवाई चप्पल और हाथ में ३०९ रायफल। कैंप के बीच से गुजरती जीपों की तलाशी करता दिखा। परिवार की आर्थिक बदहाली के चलते हाथ में बन्दूक उठाने को मजबूर एक ऐसा जवान जो समग्र विकास के नारे से खुद को कोसों दूर पा रहा था। पैसों की खातिर अपनों के खिलाफ बन्दूक उठाने को मजबूर।
सरकारी तबका मानता हैं की बस्तर में आदिवासियों का शोषण नहीं हुआ है। सिर्फ नक्सली नेता ऐसे ही स्थानीय लोगों में आक्रोश पैदा करने की कोशिश करते हैं। लेकिन आदिवासियों में इतना गुस्सा भी ऐसे ही नहीं परवान चढ़ सका है। बस्तर संभाग में चिरोंजी बहुतायत में पैदा होती है। वहां के व्यापारी आदिवासियों से चिरोंजी खरीदते थे और उसके बदले उतनी ही मात्रा में नमक दिया करते थे। वस्तु विनिमय की पुरानी परंपरा यहाँ अब तक दिखती रही है। लेकिन चिरोंजी के बदले नमक!!! शायद इस घोर अन्याय का असर नक्सलवाद के तौर पर दिख रहा है....ऐसा माना जा सकता है। मैं यहाँ नक्सल आन्दोलन का समर्थन कतई नहीं करता हूँ। लेकिन जमीनी हालात भी समझने होंगे। आज तस्वीर बदरंग है। अपनों से डरकर लोग शिविरों में रहने को मजबूर हैं।
बच्चे टूटी इमारतों में अपना कल सुधारने की जुगत में है। कभी खेलते कूदते पगडंडियों पर चल कर स्कूल जाया करते थे। आज बन्दूक के साए में कलम थामने को मजबूर हैं। एक अध्यापक एक साथ पहली से पांचवी तक के बच्चों को तालीम देते नजर आते हैं। लोग परेशान हैं। नरेगा के तहत काम तो मिलता है लेकिन ना के बराबर। ४२ दिन का औसत रोजगार का आंकड़ा इन शिविरों में और कम हो जाता है।
जिन्दगी बदहाल है। आदिवासी नक्सलियों से हथियार डालने की अपील करते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है। भले ही उनकी लड़ाई लड़ने का दावा किया जाता हो। लोगों की आँखों में आंसू उनकी व्यथा साफ़ झलकते हैं। उम्मीद है उनके सपने जल्द पूरे होंगे। वो भी इस शिविर रुपी कैद से बाहर निकल कर खुले आसमान में एक कैदी की तरह नहीं बल्कि एक स्वतंत्र नागरिक की तरह जी सकेंगे। इसी उम्मीद में.....

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

महंगाई - इसकी टोपी उसके सर!!!

''महंगाई से निपटने के लिए केंद्र दिखा गंभीर, अलग अलग तीन कमेठियाँ गठित''

राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोर ग्रुप की बैठक में यह अहम फैसला लिया गया। कोर ग्रुप की यह पहली बैठक थी। लिहाज़ा इसे एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन यह उपलब्धि आखिर है किसकी? केंद्र की ? राज्यों की ? या फिर आम इंसान की ? बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है। खाद्य मुद्रा स्फीति १७.७ फीसदी के आंकड़े को छु चुकी है। ज़ाहिर है सरकार के सामने मुश्किलें और ज्यादा बढ गयी हैं। ऐसे में कमेटियों के इस गठन के कई पहलू सामने आते हैं।

01- संसद में जब विपक्ष महंगाई के मुद्दे को उठाने की कोशिश यह समझाने की होगी कि राज्यों के साथ बात हो चुकी है। कमेटियां गठित कर दी गयी हैं। रिपोर्ट जल्द आने वाली है। उसके आधार पर कदम उठाये जायेंगे। इन तीन कमेटियों में से एक के मुखिया गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। लिहाज़ा बीजेपी को भी चुप करने की कोशिश की गयी है।

02 - जब तक इन कमेटियों की रिपोर्ट आएगी तब तक रबी की फसल भी आ चुकी होगी। जानकर मानते हैं कि कीमतें खुदबखुद कम हो चुकी होंगी। ऐसे में रिपोर्ट का औचित्य ही नहीं रहेगा।

०३- जिन तीन मुद्दों को लेकर कमिटी गठित की गयी हैं। क्या इनपर पहले कोई कमिटी नहीं बनी? कृषि उत्पादन, सार्वजानिक वितरण प्रणाली और उपभोक्ता मामलों पर इस देश में अनेकों कमेटियां बन चुकी हैं। सिफारिशों का ढेर सा लग चूका है। उन सिफारिशों पर क्या सरकार ने कभी कुछ कदम उठाए हैं? अधिकतर पर नहीं। ऐसे में जो सिफारिशें यह कमेटियां देंगी। क्या गारंटी है कि सरकार उनको मानेगी ही?

०४ - इस पूरी रस्साकशी का आम इंसान को क्या फायदा? मेरे ख़याल में कुछ नहीं। वो पहले भी महंगाई से परेशान था। आज भी है और मौजूदा हालात को देख कर लगता है कि आने वाले दिनों में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक अच्छी बात ज़ेहन में आती है और वो है केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर होते रिश्ते। शायद यह पहला मौका होगा जब केंद्र ने महंगाई जैसे मुद्दे पर राज्यों को साथ लिया हो। भले ही इसके पीछे राजनीती ही हो और vat के बाद यह शायद दूसरा मौका होगा जबकि केंद्र और राज्यों के बीच कोई कमिटी गठित की। vat के परिणाम सकारात्मक दिखे हैं। वजह दोनों के बीच का बेहतर तालमेल मानी जा सकती है। यह एक अच्छी पहल जरूर कही जा सकती है। भले ही इसके नतीजों को लेकर मैं ज्यादा उम्मीदें ना रखता हूँ।

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

विधानसभाओं में हंगामा: बड़े रोग का छोटा लक्षण


हाल ही में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दो विधायकों को मार्शलों की मदद से बाहर निकालना पड़ा, वहीं राजस्थान में विधायकों की मार्शलों से भिड़न्त हुई। नतीजा चार विधायकों के चोटिल होने की खबर अखबारों और खब़रिया चैनलों में प्रमुखता से दिखी। कुछ दिन तक चला राजनीतिक ड्रामा आखिरकार समाप्त हुआ। मुख्यमन्त्री के दखल के बाद मामला सुलझा और शान्तिपूर्ण तरीके से सदन चलने की खबर आई। वैसे ये पहली बार नहीं है कि किसी राज्य विधानसभा में इस तरह का मामला सामने आया हो। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण और बाद में शोपिंया काण्ड को लेकर मचे बवाल की झलक लोग देख ही चुके हैं।


इस तरह के शोरशराबे, हंगामे और भिड़न्त के लिए उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले सबके जे़हन में आता है, लेकिन बाकी कई राज्य विधानसभाएं भी इस कतार में खड़ी नज़र आती हैं। बीते साल फरवरी में आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी मार्शल और विधायक आमने-सामने थे। बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की विधायिकाओं में भी जनप्रतिनिधि अपनी ``जिम्मेदारी´´ का एहसास कराते रहे हैं।

इस तरह की घटनाएं अक्सर सोचने को मजबूर करती हैं। क्या सदन के प्रति जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है? जानकारों का एक बड़ा तबका इस बदलाव की पुष्टि करता है। इस बदलाव की कई वजह हैं। किस तरह के जनप्रतिनिधियों को हम और आप चुनकर राज्य विधानसभाओं में भेज रहे हैं। वर्ष 2008 में पांच राज्यों (दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम) में विधानसभा चुनाव हुआ। गैर सरकारी संगठन `नेशनल इलेक्शन वॉच´ ने 549 विधायकों से प्राप्त हुई जानकारी के आधार पर चौंकाने वाली जानकारी दी। 549 में से 124 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। यानि हर 5 में एक विधायक दागी था। वैसे ये सिर्फ झलक भर है। उत्तर भारत के एक बड़े राज्य के 49 काबीना मन्त्रियों में से 22 मन्त्री हत्या या किसी अन्य संगीन मामले में अदालत के चक्कर लगा रहे थे।

स्थिति साफ लेकिन चिन्ताजनक है। हत्या, अपहरण, लूट और फिरौती के मामले में दोषी लोग जब विधायक बनेंगे तो विधानसभा में ऐसा होना चौकाने वाला नहीं लगना चाहिए। राजनीति का अपराधीकरण या अपराधीकरण की राजनीति का सवाल पेचीदा हो चला है। हालांकि घोर आशावादी ऐसा नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि देश की 4100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर आपराधिक पृष्ठभूमि के प्रतिनिधि काफी कम हैं और जनता अपने वोट के प्रति गम्भीर हो रही है।

अपराधीकरण के बाद दूसरी वजह मीडिया की भूमिका को भी माना जाता है। टेलीविजन ने मानों जनप्रतिनिधियों का `कर्तव्य´ ही बदलकर रख दिया है। वैसे अखबार जगत का भी इस कार्य में अहम योगदान है। विधायकों और सांसदों को लगता है कि शोरशराबा, हंगामा और माइक तोड़कर ही सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं। इससे अपने चुनाव क्षेत्र की जनता को अपनी `जिम्मेदारी´ और `कर्तव्य परायणता´ का एहसास कराया जा सकता है। ऐसा होता भी है।
चार-पांच घंटे की तैयारी कर चर्चा में भाग लेने वाले जनप्रतिनिधि अगले दिन अखबार में अपना नाम पाने को तरस जाते हैं। अखबारों में ऐसे गम्भीर जनप्रतिनिधियों के लिए स्पेस नहीं होता और ख़बरिया चैनलों की टीआरपी का तो इससे कोई वास्ता ही नहीं है। लिहाजा जनप्रतिनिधि खुद को हतोत्साहित महसूस करता है। जबकि हंगामा, सदन ना चलने देना या मार्शल से भिडन्त मीडिया के लिए मसाले का काम करती है।
जो जितने भयावह तरीके से ख़बर पेश करता है वो ही शायद सबसे ज्यादा खुद पर इठलाता है। ऐसे में जिम्मेदारी दोनों की है। लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ को अपनी गम्भीरता समझनी होगी।

कुछ और पहलू भी गौर करने लायक हैं। विधानसभा और संसद की बैठकों की संख्या साल दर साल कमी होती जा रही है। 1952-1961 के बीच संसद की औसतन सालाना बैठक 124 दिन हुआ करती थी। 1992-2001 तक औसतन सालाना बैठक घटकर 81 दिन रह गई। 2008 में संसद की कार्रवाई महज 46 दिन तक चल सकी, जो अभी तक सबसे कम थी। 1988 में आखिरी बार लोकसभा की कार्रवाई 100 दिन से ज्यादा चल सकी थी। वहीं 1974 में राज्यसभा की सालाना बैठक 100 दिन का आंकड़ा आखिरी बार छू सकी थी। ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिकी कांग्रेस में सालभर में आज भी औसतन 140 से 150 दिन सदन चलता है। संसद की कार्रवाई न्यूनतम कितने दिन हो, इसको लेकर भारतीय संविधान में कोई खास उल्लेख नहीं है। बस दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अन्तराल नहीं होना चाहिए। वैसे संसद की कार्रवाई सालभर में कम से कम 100 दिन और विधानसभाओं की बैठक उनकी सीटों की संख्या के आधार पर चले, इस बात पर खासा जोर दिया जाता रहा है।

मौजूदा लोकसभाध्यक्ष की कोशिश भी सदन की कार्रवाई कम से कम 100 दिन चलाने की है। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलनों में भी इस बारे में खासी चर्चा होती रही है। लेकिन कोई सकारात्मक नतीजा नहीं दिख सका है। राजस्थान की 11वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 143 दिन और 12वीं विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल में कुल 140 दिन ही सदन चल सका है। उत्तराखण्ड में 2007 में कुल 16 जबकि 2008 में कुल 20 बैठकें हुई हैं। कर्नाटक विधानसभा में साल भर में कभी 90 से ज्यादा बैठकें होती थीं, आज आंकड़ा 30 के करीब सिमट चुका है। ये सिर्फ उदाहरण भर हैं। अधिकांश विधानसभाओं की कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा माना जाता है कि यदि सदन ज्यादा दिन चलता है तो विपक्ष के पास अपनी बात रखने का पर्याप्त समय होता है, जो हंगामे को कम करने में मददगार होता है।

ऐसे में कहा जा सकता है कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रही हैं। जिसे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सही नहीं कहा जा सकता है। लिहाजा जिम्मेदारी कार्यपालिका की भी है। वैसे एक सवाल विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भी है। जितने दिन सदन चलता है क्या उतने दिन जनप्रतिनिधि सदन के प्रति पर्याप्त समय निकाल पाते हैं? इसके साथ ही गम्भीर मुद्दों और विधेयकों पर चर्चा का समय भी साल दर साल घटता जा रहा है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष की चुनौतियां भी ज्यादा हो जाती हैं।
निष्पक्ष रहते हुए सदन की कार्रवाई सुचारू ढंग से चलाना आज के दौर में टेढी खीर साबित हो रहा है। अध्यक्ष की निष्पक्षता भी अक्सर सवालों के घेरे में दिखती है। कहीं ये सवाल काफी हद तक सही भी दिखते हैं और कहीं सिर्फ राजनीति से प्रेरित।
विधानसभा अध्यक्ष को अपनी मूल पार्टी की बैठकों में शामिल होना चाहिए या नहीं? यह मुद्दा अभी भी चर्चा का विषय है। लेकिन स्पीकर भी मूलत: राजनीतिक दल के नेता होते हैं। पांच साल बाद उन्हें भी अपनी चुनावी वैतरणी पार लगानी होती हैं। लिहाजा वे करें भी तो क्यार्षोर्षो ऐसे में सवाल उठने भी जायज हैं।

आखिर में इन घटनाओं को रोकने के लिहाज से कई सुझाव सामने आते हैं। मसलन, विधायकों को सदन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। मीडिया को अपनी गम्भीरता दिखानी होगी। कार्यपालिका को ज्यादा दिन सदन चलाने की कोशिश करनी होगी। जनप्रतिनिधियों का गम्भीर बहस में ज्यादा हिस्सेदारी और सदन में पर्याप्त उपस्थिति का प्रयास हो। गम्भीर भूमिका निभाने वाले जनप्रतिनिधि को सदन में प्रोत्साहित और सम्मानित किया जाए। साथ ही `काम नहीं तो वेतन-भत्ता नहीं´ पर विचार हो। राजनीति में अपराधीकरण कम हो और विधानसभा अध्यक्ष को अपनी निष्पक्षता का एहसास हो। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा हो पाना किसी सपने के सच होने के समान है। लेकिन अगर सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ती है तो क्या सदन की कोई सकारात्मक तस्वीर आएगीर्षोर्षो क्या तब माइक नहीं टूटेंगे? क्या तब सिर्फ गम्भीर चर्चाएं होगीं? क्या तब सब कुछ वैसा ही होगा जैसा जनता अपने नेता से उम्मीद रखती है? फिलहाल सिर्फ उम्मीदें रखी जा सकती हैं।


इस लेख को प्रभासाक्षी.कॉम पर भी देखा जा सकता है। सुझाव जरूर दें।
धन्यवाद।