Wednesday, June 11, 2008
मीडिया पर साई कृपा
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून

आर्येंद्र पिछले करीब दो सालों से यूपीए सरकार की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक "राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून" को कवर कर रहे हैं। देश के कई राज्यों में योजना की हकीकत को करीब से देखने के बाद लोगों तक सच्चाई लाने का काम आर्येंद्र ने बखूबी किया है। मेरी गुजारिश पर उन्होंने अपनी राय बेबाकी से रखी हैं। उम्मीद है आप सहमत होंगे।
आर्येंद्र प्रताप
Friday, June 6, 2008
हिमाचल और हिंदुस्तान
हाल ही में हिमाचल प्रदेश विधान सभा कवर करने का मौका मिला। सूबे की राजनीति को थोड़ा करीब से समझने की कोशिश की। हालांकि राजनीति के खेल को समझना टेडी खीर माना जाता है। इस लिहाज़ से ये मेरे लिए भी कठिन काम था। बहरहाल, विधानसभा में जन प्रतिनिधिओं की भूमिका किस तरह की है? इस मसले पर मैंने हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष तुलसी राम से बातचीत की। हिमाचल की राजनीति से पहले बात तुलसीराम जी की। तुलसी राम जी भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, जो चम्बा जिले भरमौर सीट से तीसरी बार विधायक हैं। किसान परिवार में जन्मे तुलसी राम का लगाव खेती से है। बागवानी के शौकीन तुलसी राम अपने व्यस्त जीवन में काफी वक़्त फूलों के रखरखाव को देते हैं। संघर्ष उनके जीवन का अहम् हिस्सा रहा है। बचपन से ही तुलसीराम का निजी जीवन बड़ा ही उठापटक भरा रहा। बचपन में ही उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया। बतौर विधायक राजनितिक करिअर की शुरुआत होने से ठीक पहले उनकी पत्नी का भी आकस्मिक निधन हो गया। तुलसीराम पूरी तरह टूट चुके थे, लेकिन उन्होनें हार नही मानी। हाल ही सूबे में हुए चुनाव उन्हें तीसरी बार जीतने का मौका मिला। इस बार जिम्मेदारी ज्यादा मिली। उन्हें निर्विरोध तरीके से बतौर हिमाचल प्रदेश विधान चुना गया।
वैसे विधानसभा का इतिहास बड़ा ही रोचक रहा, ब्रिटिश राज में मुल्क की राजधानी रहे शिमला में काउंसिल चैंबर की दरकार महसूस हुई। लिहाज़ा १९२० में इस भवन का निर्माण शुरू हुआ जो करीब ५ साल तक चला। उस ज़माने में करीब १० लाख की लागत से बनी ये इमारत ब्रिटिश हुकूमत की आखिरी इमारतों में से एक है। उस ज़माने की कौंसिल चैंबर आज की विधानसभा है। मौजूदा दौर में हिमाचल में ६८ विधानसभा सीटें हैं।
इन सबके बीच जो बात अहम् थी वो था वहां की राजनीती का स्तर। तुलसी राम ने बताया की शोरशराबा हिमाचल की राजनीती का हिस्सा कभी नही रहा। वाकआउट या विरोध प्रदर्शन हिमाचल विधान सभा में बमुश्किल ही देखने को मिलता है। स्पीकर का साफ तौर पर मानना था की जनप्रतिनिधि विधानसभा में मुद्दों को लेकर गंभीर नजर आते हैं। हर मसले पर सार्थक चर्चा होती है। हर मसला सिर्फ़ राजनीती से जोड़ कर नही देखा जाता। स्पीकर ऐसे माहौल से सतुन्ष्ट नजर आते हैं। ये सब सुनके मुझे देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था लोकसभा का ख्याल आया,जहाँ हंगामा सदन की कार्यवाही का एक हिस्सा नजर आने लगा है। शोरशराबा संसद का प्रतीक बनता जा रहा है। जनता साफतौर पर मानती है की संसद में काम नही हंगामा होता है और जनता का पैसा घटिया राजनीती के चलते बरबाद होता है। जनप्रतिनिधि अपनी जनता के प्रति कितने गंभीर है इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से साफ पता चलता है। ऐसे में लोक सभा स्पीकर करें भी क्या? अक्सर सांसदों को सख्त हिदायत देते स्पीकर अक्सर लाचार से नजर आते है। ऐसे में उम्मीद है की लोकसभा में बैठे कुछ सांसद जो सदन,राजनीती और मुल्क की एक अलग छवि पेश करने में जुटे हैं, उन्हें अक्ल आएगी और लोकसभा भी हिमाचल विधानसभा की तरह नजर आएगा। लेकिन ऐसा मुमकिन कब होगा ये कहना शायद हर राजनेता के लिए मुश्किल काम होगा, मेरे लिए और ज्यादा कठिन।
वैसे लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने कई अहम् सुझाव दिए है, मसलन कम नही-पैसा नहीं और जनता की अपेक्षा पर खरा न उतरने वाले सांसद को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिया जाए यानि राइट टू रीकाल. ऐसे में अगर इन सुझावों पर ध्यान दिया जाए तो यकीनन आने वाले दिनों में हिमाचल जैसी राजनीती हिंदुस्तान की भी होगी.... हालांकि राजनितिक स्वार्थौं की बहुलता के चलते ऐसा मुश्किल ही दिखता है.
Thursday, June 5, 2008
अग्रज ओमप्रकाश...
बिहार से ताल्लुक वाले ओपी की राजनीति और व्यापार पर अच्छी पकड़ लंबे अरसे से रही है। इसके अलावा भी कई मसलों पर ओपी ने कई शानदार कार्यकम पेश किए हैं, वो भी सीमित संसाधनों में। ४० साल नक्सलवाद, केंद्रीय बजट, रेल बजट, ग्लोबल वार्मिंग, जूनून क्रिकेट का, नई राजनीति जैसे कई मुद्दों पर ओपी ने अपनी राय बेबाकी से रखी। उम्मीद है कि वो अपनी रचनात्मकता से हमें आगे भी कुछ न कुछ सिखाते रहेंगे।
अनुराग
Wednesday, June 4, 2008
युवाओं का देश

हाल ही में सयुंक्त राष्ट्र संघ ने वर्ल्ड यूथ रिपोर्ट जारी की, जिसमें न सिर्फ़ इस मुल्क के बल्कि पूरी दुनिया के युवाओं का जिक्र है। ये रिपोर्ट दुनिया भर के युवाओं की तस्वीर सामने रखती है। यहाँ ये भी साफ कर दे कि सयुंक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक युवाओं कि उम्र १५ से २४ साल है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में युवाओं की संख्या करीब एक अरब है। यानी हर पाँच में से एक युवा है। इन नौजवानों की तादात विकासशील देशों में कहीं जयादा है। मतलब साफ है कि हिंदुस्तान में युवाओं की कमी नहीं। इस रिपोर्ट में जहाँ कई आंकडें चौकानें वाले हैं वहीं कुछ राहत भी देते हैं।
मसलन ११५ मिलियन बच्चे आज भी प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। इनमे ५७ फीसदी लड़कियां हैं। स्वास्थ्य की तस्वीर भी बेहतर नही है। एचआईवी एड्स महामारी के तौर पर देखी जा रही है। हर १४ सेकंड में एक युवा एच आई वी का शिकार हो रहा है। गरीबी विकास में भी रोड़ा बन रही है। दुनियाभर के नौजवानों की आबादी का १८ फीसदी हिस्सा रोजाना एक डॉलर से भी कम में जिन्दगी जीने को मजबूर है। यह तस्वीर पूरी दुनिया की है। वैसे इन आंकडों असर हमारे मुल्क में न हो, ये मुमकिन नही। हिंदुस्तान में युवाओं की तादात काफी ज्यादा है। बाजार इन्ही के लिए सजे हैं। उत्पादों पर छूट इन्हीं के लिए है। सबका मकसद इन्हीं युवाओं को अपनी और खीचने का है। युवाओं के पास भी अचानक पैसा आ गया है। कैश न सही क्रेडिट कार्ड ही सही। पूरी दुनिया को अपने कब्जे में करने की चाह पैसा खर्च करने को मजबूर करती है। रियल इस्टेट से लेकर रीटेल सेक्टर तक हर बदलाव युवाओं के लिये ही है।
इन सबकेबीच युवाओं से जुड़े इन मसले ऐसे भी हैं जो गंभीरता से सोचने पर मजबूर करते हैं ।शिक्षा से लेकर रोजगार पाने की जद्दोजद युवाओं को कितना और कहाँ तक तोड़ती है, ये देखने वाला कोई नहीं. निराशा युवाओं को खोखला कर रही है। पिछले कुछ सालों में नौजवानों में बड़ते खुद्खुशी के मामले इसी और इशारा करते हैं। दरअसल जब सपने सच नही होते तो कुंठा जन्म लेती है। कभी ये कुंठा ख़ुद को मारने पर मजबूर करती है तो कभी दूसरो को।
इन सबके बीच हमारे आसपास की दुनिया कुछ आधुनिक सी हो गयी लगती है जिसमें परम्पराएं भी हैं लेकिन सकुचाई हुई सी। संस्कृति भी है पर सहमी हुई सी। आजादी के मूल्य भले ही थोड़े धुन्दले दिखाते हो या राष्ट्रीय पर्व महज़ औपचारिकता दिखते हों। पर युवा आज भी अपने मुल्क को उसी जज्बे से प्यार करता है जो सपना मुल्क के पुरोधाओं ने देखा था।
अनुराग

